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________________ अन्योऽपि वित्तो भुवि बुद्धिसागरः पाण्डित्यचारित्रगुणैर्गतोपमैः। शब्दादिलक्ष्मप्रतिपादकानघग्रन्थप्रणेता प्रवरः क्षमावताम्।।3।। तयोरिमां शिष्यवरस्य वाक्याद् वृत्तिं व्यधाच्छ्रीजिनचंद्रसूरेः। शिष्यस्तयोरेव विमुग्धबुद्धिम्रन्थार्थबोधेऽभयदेवसूरिः।।4।। जिनवल्लभगणिजी का उल्लेख 12.अभयदेवसूरिजी के उल्लेखों के बाद जिनवल्लभगणिजी की 'अष्टसप्ततिका' (चैत्य प्रशस्ति) का उल्लेख यहाँ पर दिया जाता है। इसमें जिनेश्वरसूरिजी द्वारा राजसभा में सुविहित मार्ग को प्रगट करके संविग्न वर्ग के विहार चालु कराने की बात लिखी है, परंतु ‘खरतर' बिरुद प्राप्ति की बात नहीं लिखी है। नृचकोरदयितमपमलमदोषमतमोऽनिरस्तसवृत्तम्। नानीककृतविकासोदयमपरं चान्द्रमस्ति कुलम्।।39।। तस्मिन्बुधोऽभवदसङ्गविहारवर्ती, सूरिर्जिनेश्वर इति प्रथितोदयश्रीः। श्रीवर्धमानगुरुदेवमतानुसारी, हारोऽभवन् हृदि सदा गिरिदेवतायाः।।40।। सामाचार्यं च सत्यं दशविधमनिशं साधुधर्मश्च बिभ्रत्तत्त्वानि ब्रह्मगुप्तीनवविधविदुरः प्राणभाजश्च रक्षन्। हित्वाष्टौ दुष्टशत्रूनिव सपदि मदान् कामभेदान् च पञ्च, भव्येभ्यो वस्तुभङ्गान्विनयमथ नयान् सप्तधाऽदीदिपद्यः।।41।। क्रूराकस्मिकभस्मकग्रहवशेऽस्मिन् दुःखमादोषतो, बाढं मौढ्यदृढाढ्यढ्यकुगुरुग्रस्ते विहस्ते जने। मध्येराजसभं जिनागमपथं प्रोद्भाव्य भव्ये हितं, सर्वत्रास्खलितं विहारमकरोत् संविग्नवर्गस्य यः।।42।। जिनदत्तसूरिजी का उल्लेख 13. जिनवल्लभगणिजी के बाद जिनदत्तसूरिजी के 'गणधरसार्द्धशतक' में जिनेश्वरसूरिजी संबंधित उल्लेख यहाँ पर दिया जाता है:अणहिल्लवाडए नाडए व्व दंसिअसुपत्तसंदोहे। पउरपए बहुकविदूसए य सन्नायगाणुगए।।65।। सड्डिअदुल्लहराए, सरसइअंकोवसोहिए सुहए। मज्झे रायसहं पविसिऊण लोयागमाणुमय।।66।। इतिहास के आइने में - नवाङ्गी टीकाकार अभयदेवसूरिजी का गच्छ /098
SR No.036509
Book TitleItihas Ke Aaine Me Navangi Tikakar Abhaydevsuriji Ka Gaccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhushan Shah
PublisherMission Jainatva Jagaran
Publication Year2018
Total Pages177
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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