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________________ प्राप्ति की बात नहीं लिखी है:"अच्चंतं सरले च्चिय अपुव्ववंसम्मि परिवहंतम्मि। जाओ य वइरसामी, महापभू परमपयगामी।।10033।। तस्साहाए निम्मलजसधवलो सिद्धिकामलोयाणं। सविसेसवंदणिजो य, रायणा थो (थे) रप्पवग्गो व्व।।10034।। कालेणं संभूओ भयवं सिरिवद्धमाणमुणिवसभो। निप्पडिमपसमलच्छी-विच्छड्डाऽखंडभंडारो।।10035।। ववहारनिच्छयनय व्व दव्वभावत्थय व्व धम्मस्स। परमुन्नइजणगा तस्स दोण्णि सीसा समुप्पण्णा।।10036।। पढमो सिरिसूरिजिणेसरो त्ति, सूरो व्व जम्मि उइयम्मि। होत्था पहाऽवहारो दूरंततेयस्सिचक्कस्स।।10037।। बीओ पुण विरइयनिउण-पवरवागरणपमुहबहुसत्थो। नामेण बुद्धिसागरसूरि त्ति अहेसि जयपयडो / / 10039 / / तेसिं पयपंकउच्छंग-संगसंपत्तपरममाहप्पो। सिस्सो पढमो जिणचंद-सूरिनामो समुप्पन्नो।।10040।। अन्नो य पुन्निमाससहरो व्व निव्ववियभव्वकुमुयवणो। सिरिअभयदेवसूरि त्ति, पत्तकित्ती परं भुवणे।।10041।।" अभयदेवसूरिजी के उल्लेख 7. नवाङ्गीटीकाकार अभयदेवसूरिजी ने भी अपने ग्रंथों में चान्द्रकुल का ही उल्लेख किया है। देखिये ‘स्थानाङ्ग सूत्र' की प्रशस्तिः तच्चन्द्रकुलीनप्रवचनप्रणीताप्रतिबद्धविहारहारिचरितश्रीवर्धमानाभिधानमुनिपतिपादोपसेविनः प्रमाणादिव्युत्पादनप्रवणप्रकरणप्रबन्धप्रणयिनः प्रबुद्धप्रतिबन्धप्रवक्तृप्रवीणाप्रतिहतप्रवचनार्थप्रधानवाक्प्रसरस्य सुविहितमुनिजनमुख्यस्य श्रीजिनेश्वराचार्यस्य तदनुजस्य च व्याकरणादिशास्त्रकर्तुः श्रीबुद्धिसागराचार्यस्य चरणकमलचञ्चरीककल्पेन श्रीमदभयदेवसूरिनाम्ना मया महावीरजिनराजसन्तानवर्तिना महाराजवंशजन्मनेव संविग्नमुनिवर्गश्रीमदजितसिंहाचार्यान्तेवासियशोदेवगणिनामधेयसाधोरुत्तरसाधकस्येव विद्याक्रियाप्रधानस्य साहाय्येन समर्थितम्। / इतिहास के आइने में - नवाङ्गी टीकाकार अभयदेवसूरिजी का गच्छ /095 )
SR No.036509
Book TitleItihas Ke Aaine Me Navangi Tikakar Abhaydevsuriji Ka Gaccha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhushan Shah
PublisherMission Jainatva Jagaran
Publication Year2018
Total Pages177
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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