________________ इतिहास के आइने में श्री अभयदेवसूरिजी का गच्छ!! स्व-पर के कल्याण हेतु ही ऐसे महापुरुषों का संसार में अवतरण होता है। वे अपने आत्म-कल्याण के साथ-साथ असमर्थ एवं बालजीवों के उपकार हेतु अपनी शक्तिओं का सदपयोग भी निःस्वार्थ भाव से करते हैं। उसी के सहारे बालजीव मोक्ष-मार्ग में गतिशील बनते हैं। कहा गया भी है “परोपकाराय हि सतां विभूतयः” / ऐसे परोपकारी महापुरुषों के जीवन को जानने एवं गुण-गान करने की तरह उनसे संबंधित ऐतिहासिक सत्यता को जानकर उसे न्याय देना भी उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पण करने का ही एक प्रकार है। इसी भावना से वर्तमान में उपलब्ध नौ अंगों की अनुपम टीकाओं के रचयिता अभयदेवसूरिजी के गच्छ के विषय में जो मत भेद है, उसके निर्णय हेतु इतिहास के आइने में देखने का प्रयास यहाँ किया जा रहा है। अभयदेवसूरिजी जिनेश्वरसूरिजी की परंपरा में ही हुए थे, यह अटल सत्य है। इसमें कोई मतभेद नहीं है, परंतु 'अभयदेवसूरिजी खरतरगच्छ के थे या नहीं' इसके निर्णय हेतु ‘खरतरगच्छ की उत्पत्ति', जो दुर्लभराजा की राजसभा में खरतर बिरुद प्राप्ति के कारण जिनेश्वरसूरिजी से बतायी जाती है, उसकी ऐतिहासिक कसौटी करनी आवश्यक बनती है, क्योंकि अगर जिनेश्वरसूरिजी से खरतरगच्छ की शुरुआत हुई हो तो ही “अभयदेवसूरिजी खरतरगच्छ के हैं" ऐसा कहना उचित ठहरता है, अन्यथा नहीं। ___अतः इसके निर्णय हेतु सर्वप्रथम जिनेश्वरसूरिजी से लेकर उनकी शिष्य परंपरा के 200 साल तक के उल्लेख, खरतरगच्छ के सहभावी रुद्रपल्लीय गच्छ एवं अन्य गच्छों के उल्लेख ऐतिहासिक प्रबन्ध तथा इतिहास विशेषज्ञों के उल्लेख यहाँ पर दिये जा रहे हैं। * जिनवल्लभगणिजी के बाद जिनदत्तसूरिजी से खरतरगच्छ एवं जिनेश्वरसूरिजी से रुद्रपल्लीगच्छ इस प्रकार दोनों परंपरा अलग होती है, अतः उन्हें सहभावी कहा है। इतिहास के आइने में - नवाङ्गी टीकाकार अभयदेवसूरिजी का गच्छ /013