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________________ भाषाटीकासहित 111 राज सभेरी मंगल स्वनः // सम्बभूव महीपाल मानिनोऽस्य दिवानिशम् // 6 // // अर्थ-कन्नौज नगरमें एक राठूर वंशमें उत्पन्न क्षत्रिय भूषण सजा जयचन्द्र हुये // 1 // जिनके नगरमें चारों फाटकों पर पांच पांच हजार सेना दिनरात शस्त्रोंको उठाये खडी रहती थी, // 2 // तथा जिन राजा जयचन्दके आज्ञानुवर्ती राजा लोग नाना प्रकारको भेट हाथमें लिये हुये नित्य प्रति आते जाते थे, और - विनय पूर्वक राजालोग महाराजा जयचन्दकी आज्ञाको _ मानते थे॥ 3 // तथा जिनके घरमें अणिमादिक सिद्धी नृत्य कर रही थी, ऐसे राजा जयचन्द्र लोकपाल समान पृथ्वीमें विराजमान थे॥४॥ और वह महाराज जयचन्द्र दानी, मानी,धनाध्यक्ष, चक्रवर्ती तथा चक्रयुद्धमें निपुण 1 // 5 // जिन महाराजके द्वारपर नित्य नौबत व नगाडा आदि मंगल दायक बाजे बजा कहते थे, ऐसे राजमान्य महाराजा जयचन्द्र हुये // 6 // P.P.AC. Gunratnasuri MS. Gun Aaradhak Trust
SR No.036493
Book TitleStree Charitra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNarayandas Mishr
PublisherHariprasad Bhagirath
Publication Year1904
Total Pages236
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size175 MB
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