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________________ SANSAR जारी चमत्कृत है, तब गणधर महाराजने फरमाया-हे नरेन्द्र ! ऐक 2 पदका अपूर्व प्रजाव है तो फिर नवपदकी तो बात ही क्या कहना! देखोः| अरिहन्त पदके आराधनसे देव राजाने मोक्ष महल प्राप्त किया, सिद्धपदके ध्यानेसे पुंड| रीक-पांडवोंने मुक्ति निकेतन उपलब्ध किया, आचार्य पदके सेवनसे परदेशी नृपने निर्वाण फल | है। हाँसिल किया, उपाध्याय पदकी भक्तिसे वजस्वामी स्वर्ग पधारे, साधुपदकी नजनासे रूपी-रो-| 6 दणी प्रमुखने सिमिजुवन आप्त किया, दर्शनपदके आराधनसे सुलसाको महा आनन्द मिला, || है ज्ञान पदके ध्यानेसे माष-तुष साधुको केवल ज्ञान उत्पन्न हुवा, चारित्र पदके सेवनासे जम्बू कुमा रको केवल ज्ञान प्राप्त हुवा, तप पदकी भजनासे दृढ प्रहारी शिवसदनको प्राप्त हुवा; इत्यादि P|| अनेक मोक्ष गये-जाते हैं और जावेंगे, यह सब श्रीसिद्धचक्र महाराजका ही प्रभाव समझना; इस प्रकार गौतम गणधरने श्रेणिक राजाके आगे नवपद महात्म्य सविस्तार वर्णन किया, जक्ति URUCHARISHIRISHIRIQISHNIQI PIAC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak 12
SR No.036490
Book TitleShripal Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagar
PublisherGaneshmal Dadha
Publication Year1924
Total Pages198
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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