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________________ श्रीपालचरित्र. BAGASJIACHIGAS OIARTE अत्यन्त हर्षमें आकर विचार करने लगी-अहा! लोग तो इसे कुब्ज कहते हैं और मैं तो सुन्द- 8 | राकार नर-रत्न देख रही हूँ, बस आपुसमें दोनोको प्रीतियुक्त कटाक्ष-बाणोंसे स्नेह उत्पन्न हुवाअब अंगरक्षिका दासीने उस कन्याको वर वरनेके लिये राज-मण्डपमें दाखिल की-क्रमशः एक 2 है राजाका रूप-ऋद्धि-कला कौशल्यादि ख्याति वह दासी प्रकट करती जाती है, सुन 2 कर , वह कुमारिका आगे 2 कदम बढाती जाती है, अखीर सब राजाओंका त्याग कर जहां कुब्ज | खड़ा है वहां पर पहुँची, तब हारके प्रभावसे उपर रही हुई पुत्तलीका इस प्रकार बोली: (श्लोक) यदि धन्यासि विज्ञासि / जानासि च गुणान्तरम् // तदेनं कुब्जकाकारं / घृणु वत्से नरोत्तमम् // 1 // भावार्थ:-हे वत्से ! यदि तूं भाग शालिनी हो, विदुषी हो, नाना गुणोंकी ज्ञाता हो तो इस कुब्ज आकार वाले नरोत्तम वरको वर ले. . ... // 62 / / Jun Gun Aaradhak Gunratasun MS
SR No.036490
Book TitleShripal Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagar
PublisherGaneshmal Dadha
Publication Year1924
Total Pages198
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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