SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 67
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 00000000000000000000 पुण्यादय चरित्र सान्वय भाषान्तर 66 00000000 ... अन्वयः-अत्र हि असंख्याः गोलाः स्युः, गोलः असंख्यनिगोंदकः, एकैकस्मिन् निगोदे स्थिराअनंता जंतवः स्युः॥१५८॥ अर्थ:-आ अन्यवहारराशिमा खरेखर असंख्य गोला होय छे, अने ते (एकेको) गोलो असंख्य निगोदोथी भरेलो होय, अने ते एकेका निगोदमा स्थिर एवा अनंता जीवो होय छे. // 159 // / ... ...... .... . अन्योन्यजन्तुसंवाससंमदोत्पीडपीडितः। जीवोऽनन्तान्भवानेकेन्द्रिय एवात्र संवसेत // 160 // . अन्वयः-अन्योन्यजतसंचाससंमर्दउत्पीडपीडित: जीवः अनंतान भवान् एकेंद्रियः एव अत्र संवसेत् // 160 // अर्थः-एकबीजा जीवोना नजीक निवासथी थयेला संघट्टनी पीडाथी दुःखी थयेलो ते जीव अनंता भवो सुधी एकेंद्रियपणामांण अहीं रहे छे.. // 160 // र उत्पत्तिनाशैस्तत्रैवाकामनिर्जरया चिरात् / स क्षिपेत्कानिचित्किंचित्कर्माणि कथमप्यथ // 161 // अन्वयः-अथ तत्रैव उत्पत्तिनाशैः चिरात् अकाम निर्जरया सः कथं अपि कानिचित् कर्माणि किंचित् क्षिपेत् // 11 // 000000000000000000
SR No.036475
Book TitlePunyadhya Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1928
Total Pages229
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size64 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy