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________________ यद्यपि आत्मा में शक्तियों का अखूट खजाना था, फिर भी शरीर जव निमित्त कारण बनता है, तब भख, तरस, थकान आदि व्याधि भी सताये विना रहती नहीं है / इस समय उन्हें जोरदार तरस सता रही थी, अतः व्याकुलता से परेशान बनी हुई दमयंती कुछ दूरी पर एक नदी देखती है, परंतु चारों तरफ नजर लगाने पर पानी की एक बूंद भी दिखाई न देने पाई, इससे जरा हताश होना स्वाभाविक था। मानवीय जीवन के संस्कार दो प्रकार के होते हैं : (1) आत्मसंयमी इन्सान (Him Self) के मन बुद्धि, इन्द्रिये तथा कार्य भी आत्मा के अधीन होनेसे उसका जीवन ही पवित्र बन जाता है, जिससे उनका शब्दोच्चारण भी मंत्र बनता है तथा विचारने पर भी देवों का सान्निध्य प्राप्त होता है / / (2) दूसरे प्रकार के आदमी आत्म के असंयमी होने से उनकी इन्द्रियें, मन, बुद्धि तथा कार्यपद्धति परघातक बनने पाती है / ऐसी स्थति में उनके मंत्र, तंत्र, जंत्र भी निष्फल बनने में देर नहीं करते। - दमयंती की आत्मा संयमी होने से तथा शारीरिक पीड़ा भी जीरसर होने से उसने इस प्रकार का संकल्प किया / "अपनी आत्मा के दर्शन, र शरीरों में पृथक-पृथक् आत्माओं के दर्शन तथा जितनी भी आत्माएँ 2 वे सब एक सी हैं, ऐसा निर्णय करवाने वाला सम्यक् दर्शन / संसार की यथार्थता को बतलाने वाला सम्यक् ज्ञान तथा जाने हुए तत्वों को जीवन में उतरवाने में पूर्ण शक्त सम्यक् चरित्र, यदि मेरे जीवन के नणु-अणु में विद्यमान हो तो यह नदी जल से परिपूर्ण वने ऐसा कहकर दमयंती ने अपनी पग की एड़ी को जमीन पर तीन बार पकारी और उसी समय स्वच्छ, शीतल तथा स्वादु जल बहने लगा व किनारे पर रहनेवाले सैकड़ों गांव के हजारों आदमी प्रत्यक्ष चमकार देखकर खुश हुए / दमयंती ने यथारुचि पानी पीया तो भी थकी हुई होने से एक वटवृक्ष के नीचे विश्रान्ति हेतु बैठ गई। 69 P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036461
Book TitleNal Damayanti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurnanandvijay
PublisherPurnanandvijay
Publication Year1990
Total Pages132
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size90 MB
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