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________________ A-% मृगापुत्र Aवासका चातुर्गतिकः संसारः / क्लेशाधारः शरीरिणां // क्लिश्यंति जंतवो यत्रा-नंतदःखैर्निरंतरं // 15 // अर्थः-आ चारे गतिओवाळो संसार प्राणीओने क्लेश उपजावनारो छे, के जेमां पाणीओ निरतर अनंता दुःखो वडे क्लेश पाम्या करे छे, अवश्यमेव गंतव्यं / त्यक्त्वा देहधनादिकं // धर्महीनस्य संसारो। भवेददःखपदं ततः // 16 // अर्थः-वळी आ शरीर तथा धन आदिक तजीने (एकदिवस) अवश्य चाल्या जवानुछे, अने तेथी धर्मरहित माणीने (आ) संसार दुःखोना स्थानरूप थइ पडे छे. // 16 // अपाथे यः पुनर्मागं / महांतं यः प्रपद्यते // सोऽपि गच्छन् क्षुधा तृष्णा-पीडितो दुःखभाग्भवेत् // 17 // अर्थः-वळी जे माणस भातुं लीधाविना म्होटी मुसाफरीये जाय छे, ते पण चालताथको क्षुधातृषाथी पीडाइने दुःखी थाय छे. अकृत्वा धर्ममेवं यो जंतुर्याति भवांतरं // स गच्छन् स्यान्महा दुःखी रोगशोकादिपीडितः॥१८॥ अर्थः-एवीरीते जे प्राणी धर्म कर्याबिना परभवमा जाप छे, ते जतोथको रोग अने शोकआदिकथी पीडित थइने अतिदुःखी / थाय छे. // 18 // यो महांतमथा ध्वानं / सपाथेयः श्रयेन्नरः // क्षुपिपासा विमुक्तः सन् / ब्रजन्नति सुखी भवेत् // 19 // अर्थः-बळी जे पुरुष भातुं लेइने म्होटी मुसाफरीये जाय छे, ते क्षुधा अने तृषाथी मुक्त थइ जतोथको अत्यंत सुखी थाय छे. P u ntatasur M.S. Jun Gun Aaradh
SR No.036454
Book TitleMrugaputra Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShubhvardhan Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1931
Total Pages24
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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