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________________ STD मृगापुत्र चरित्रम् - कृत्वाहद्धर्ममेवं यः / प्रयात्यन्य भवं भवी // आधि व्याधि विनिर्मुक्त-स्तत्र गच्छन् सुखी भवेत् // 20 // अर्थः-एवीरीते जे भव्य माणस जैनधर्म आचरीने परभवमा जाय छे, ते त्यां जतोयको आधिव्याधिथी मुक्त थइने सुखी ॥६॥माथाय छे. // 20 // लग्ने यथाग्नौ स्वावासे / तत्पतिः सारवस्तुनः // करोति कर्षणं नूनं / मुक्त्वाऽसारपरिग्रहं // 21 // अर्थः-पोताना घरमा आग लागवाथी तेनो मालीक जेम खरेखर असार वस्तुओने त जीने उमदी वस्तुओ बहार कहाडी लीये छे, // 21 // एवं लोके जरामृत्य्वा-द्यग्निना व्याकुली कृते // आत्मानं तारयिष्यामि / पूज्यौ युष्मन्निदेशतः // 22 // अर्थः-एवीरीते हे पूज्यौ ! जरा तथा मृत्युआदिक रूप अग्निथी व्याकुल थयेला आ लोकमांथी, आपनी आज्ञावडे हुं पण मारा आत्मानो उद्धार करीश. // 22 // मृगापुत्रेण तेनेति / कथिते पितरावदः॥ प्रजल्पतश्चिरं वत्स / श्रामण्यमति दुश्चरं // 23 // अर्थ:-ते मृगापुत्रे एम कहेवाथी तेना मातापिता तेने एम कहेचा लाग्या के, हे वत्स ! लांबा काळसुधी चारित्र पाळबुं बहु मुश्केल छे // 23 // SSSSSSSS %-964955 Gunratnasarl M.S Jun Gun Aarad lust
SR No.036454
Book TitleMrugaputra Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShubhvardhan Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1931
Total Pages24
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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