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________________ धम्मि| मिलिप्ता व जटाः / कपिशा मूर्ध्नि विव्रतं // जपसग्मणिसंचार-व्यग्रदक्षिणपाणिकं // ए४ // ब. / छपद्मासनं रत्न-रोचिःसंकोचिलोचनं / स तत्र नैरवाचार्य-मार्यबुधिखंदत / / 55 // युग्मं ॥था शीः पूर्व ददद्योगी। व्याघ्रचर्मासनं निजं // नाहं पूज्यासनस्याहः / कुमारणेत्यवार्यत // 6 // 255 निविश्य भृत्यमुक्तेऽथो-तरीये योजितांजलिः // प्रजो नियुंदव मां योग्ये / कर्मणीति जगाद सः // 7 // बालापगोचरीचक्रे / योगतं गीतविक्रमं / हृदि नस्त्वं निविष्टोऽसि / वार्ता चर्मासन| प्रानातिक कार्य करीने स्वल्प परिवारसहित वनमा गयो. // ए३ // जाणे अमिथी लेपायेला होय नहि तेम पिंगळी जटाने मस्तकपर धारण करनारा, जपमालाना मणका फेरववामां रोकायेल ने जमणो हाथ जेनो एवा, // ए४ // पद्मासन वाळीने बेठेला तथा रत्ननी कांतिसरखा संकोच पामेला नेत्रोवाळा ते भैरवाचार्यने त्यां शुरू बुध्विाळा ते राजकुमारे वांद्या. // 55 // श्राशीर्वा. दपूर्वक पोतानुं व्याघचर्मर्नु अासन देनारा ते योगीने हुं आप पूज्यना धासनने योग्य नथी. एम कही ते कुमारे तेम करतां अटकाव्या. // 76 // पनी पोताना नोकरे मुकेला दुपट्टापर बे. | शीने हाथ जोमीने कुमार बोल्यो के हे प्रतु ! मने योग्य कार्यमा जोडो? // // पजी प्रसि. Jun Gun Aaradhak P.P.AC.Gunratnasuri M.S.
SR No.036431
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages176
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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