________________ 255 डुमनद्यााद धम्मि- स्तदग्रतः // 14 // तत्प्रसादेऽप्यनुत्सेक-स्तदन्यैरप्रजल्पनं // परवेश्मन्ययानं चा-संकृतियोपितो मियं / / 75 / / युग्मं / / श्वश्रूसुश्रूषणं गर्तृ-क्तिः स्वजनरंजनं // गर्तृमित्रेषु च प्रीति-रिति री तिर्मगीदृशां / / 76 // श्मां प्राप्य पितुः शिदां / सुश्रीमिव चचाल सा // पत्या विनोद्यमानादि| अमनद्यादिदर्शनैः // 70 // समं सैन्यैरतिकाम -नध्वानं प्राप पनुः // स्नेहादभिमुखायात-मिव डाग हस्तिनापुरं // 70 // अनुरागात्तमन्यांगा-ज्जनको जनकोटियुक् // शीतांशावुदिते वार्डः तेने आसन आपq, तेना सुताबाद सुवं, तथा तेनी पहेला जठवू. // 14 // पतिनी घणी महेरबानी थाय तो पण घणो नत्सेक करवो नहि, तेना शिवाय अन्य पुरुषोसाथे बोलवू नहि, अने परघर जq नहि, ए स्त्रीनने शोगावनारां . // 35 // सासुनी सेवा करवी, जरिनी नक्ति के | खी, स्वजनोने खुशी करखा, तथा पोताना जरिना मित्रोपते प्रीति राखवी, ए स्त्रीनन रीत में. // 16 // एवी रीतनी उत्तम लक्ष्मीजेवी पितानी शिखामण ग्रहण करीने ते त्यांथी चालवा लागी. तथा पति तेणीने मार्गमा पर्वत, वृक्ष तथा नदी आदिक देखामीने विनोद कराववा लाग्यो / | // 7 // सैन्यसहित मार्ग जेलंगतो ते राजपुत्र स्नेहथी जाणे सन्मुख अाव्यु होय नहि तेम ते / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust