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________________ धम्मि- ताग्रतः / / 55 // पिपर्ति संपदो यस्य / कोशाध्यद वोदधिः // सोऽयं सूरः सुराष्ट्रायाः / पतिरा श्रियतां पतिः // 56 // शत्रुजयोऊयंताख्ये / दूरगव्यैरासदे / / पत्यानेन सुखेन त्वं / महाती थै प्रणस्यसि // 27 // सावदद्यांति सौराष्ट्रा / निशि निद्रासुखं कथं // येषां संनिहितः कर्ण-स्फो. 251 ट्घोषः सदोदधिः // 27 // सर्वानेवं प्रतीहारी। व्याचचक्षे दमानुजः // चुकुन्ने न पुनर्वाला / खलयाद्योगिनीव सा ॥रणा अबायेव सा कन्या / यमुपेयाय सोऽतुषत् // यं मुमोच पुनः सो. लीके, // 25 // नंडारीनीपेठे जेनी संपदाने समुद्र पूरी पाडे, ते था सुराष्ट्र ना सूरराजाने तुं पोताना स्वामीतरीके स्वीकार? // 56 // वळी या स्वामीनी साथे तुं दूरजव्योने लन एवा शत्रु जय अने गीरनार नामना महातीर्थोने सहेलाथी नमी शकीश. // 57 / / त्यारे कनकवती बोली के कान फोडी नाखे एवा शब्दवाळो समुद्र जेनी नजीकमां रहेलो एवा सुराष्ट्रना लो. को सखे निद्रा पण केम करी शके ? // 50 // एवी रीते प्रतिहारीए सर्व राजानुं वर्णन कर्य, परंतु ते राजकन्या योगिनीपेठे पोताना निश्चयथी चलित थ नहि. // 55 // वादळांनी गया. | नापेठे ते कन्या अहिं जेनीपासे आवो ते खुशी थवा लाग्यो, परंतु जेने गेमवा लागी ते खे . Jun Gun Aaradhak Trust . P.P.AC. Gunratnasuri M.S.
SR No.036431
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages176
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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