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________________ 237 धम्मि- तवासरं // 5 // चलध्वजांचलापास्त-जनजातपरिश्रमं // शिल्पिणिः कल्पयामास / स स्वयंवर मंडपं / / 70 // यत्र स्फटिकजागे / विचित्रोझोचबिंधनैः // विना यत्नं जवचित्र / चित्रं कस्य च कार न / ए१ // यत्र स्तंगानवष्टन्य / निश्चलांगतया स्थिताः / जनसंमर्दनीत्येव / रेजिरे स्वर्णपुत्रिकाः // 7 // चतुर्दिगितजूपानां / संमुखीजवनेन यः // यातिथ्यमिव निर्मातुं / चतुर्दारमुखोऽजनि / / ए३ // महत्वाद्यत्र मंचेषु / प्राप्तेष्वासनमुख्यतां // वर्णसिंहासनश्रेणी। बजार मु. रह्यो में एवो, // 7 // तथा नमती ध्वजाना बेडानथी दूर थयेल ने लोकोनो परिश्रम ज्यां एवो एक स्वयंवरमंम्प कारीगरोपासे कराव्यो . // ए० // जे मंडपमां स्फटिकनुं त्रुमितल बना व्यु , तेमां (जंचे बांधला) विचित्र चंद्रवानां प्रतिबिंबोथी प्रयत्नविनाज थयेधुं चित्रामण को. ने अाश्चर्य करतुं नथी? // 1 // त्यां लोकोनी गीरदीना मरथी जाणे स्तंनोने बालीने निश्चल शरीरथी रहेली स्वर्णनी पुतली शोभी रही . // 7 // चारे दिशाथी श्रावता राजाननी सन्मुख होवाथी जाणे तेजना अादरसत्कारमाटे होय नहि तेम ते मंझप चार दरवाजावाको थ यो.... / / 73 / / महोत्सव होवाथी मुख्य बासनपणाने प्राप्त थयेली खुरशीजपर रहेली स्वर्णना Jun Gun Aaradhak Trust P.P. Ac. Gunratnasuri M.S
SR No.036431
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages176
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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