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________________ धम्मि मौ जमिचारिणौ / क तत्र भूषापतनं / क चावायं तैदागमः / / 44 // किं न जानाम्यहं नैव / / दैवज्ञः सैष सागरः // अस्तु वाचस्तु दूरस्थं / कथमतानयेत्पुनः // 45 // नूनं केनापि योगेन / / तत्र संभाव्यते गतः / / स्वामी में सात्विकः सत्व-वतां किं नाम दुर्घ // 46 // यदद्यश्वोऽयमाया 22/ ति / प्रातरेवात्र सत्वरः / / अधाते व निखाया / दृश्ये अस्येदणे अपि // 4 // ध्रुवमेकमंति ये। यःशाव्यनिधी श्मौ // दंनेनानेन मुग्धायाः। प्रवृत्तौ खेदनाय मे // 40 || ध्रुप मैन्युपूराथ्वीपर चालनारा मनुष्यों क्या ? ते पाषण पडवानुं स्थान क्यां? अने तेनु या नहीं पाववं क्यों ? // 4aa वळी आ सागर ज्योतिषी नंथीज एम पण शुं हुं नयी जाणती? वळी तेसंबंधि कहे तो दूर रहूं, परंतु ते भाषण अहीं ते केम लावी शके ? // 45 // माटे खरेखर कक प्रयोग थी मारो हिंमती स्वामी त्यां गयेलो संभवे ने, केमके हिमतवानोने शुं मुश्केल ? // 6 // केमके आजकाल तो ते वळी प्रजातमांज जलदी अहिं आवे , तेम तेनी आंखो पण जाणे निद्राथी न धराणी होय नहि तेम घेरायेली देखाय . // 4 // खरेखर अत्यंत लुचाश्ना नं. डारसरखा तेन बन्ने एकमत थश्ने श्री कपटक्रियाथी मने मुग्धाने खेदित करवाने तत्पर थया ने. / P.P.AC. Gunratnasuri M.S... . Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036431
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages176
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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