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________________ ২০ষ धम्मि- न्यास-चतुरोऽपि व्यजीयत // 6 // किंचिद्दत्वा फलं नाय / व्यंजयस्व जयं मम // अतः परं रिः / रंसुश्चेत् / तत्त्वं किमपि सारय // 7 // तया सोत्पासमित्युक्ते / कुमारः स्फारकैतवः // किंचित्तवांतिके ऽस्तीति / सुहृदो मुखमैदात ॥ायुग्यं। सोऽप्यूचे किंकिणीं मुक्त्वा / नान्यत्किंचिदिहास्ति मे // सोडवक् तामेव मे देहि। यत्तयास्ति प्रयोजनं॥णा सागरोऽथ कुमारस्य। किंकिणीमार्पयत्करे / / प्रत्यनिझाय तां दृष्ट–मात्रां साद् भृशाकुला // 10 // श्यं न वृश्चिकः किंतु / किंकिणी किं त्वमाकुसो. // 6 // हे स्वामी! मने कईक फल पापीने मारी जीत प्रगट करो? अने हवे पजी पण जो आप रमवाने चहाता हो तो कर्शक शरत करो? // 7 // एवी रीते तेणीए जरा तमाकाबंध कहेवाथी कपटक्रियामां चतुर एवा ते कुमारे पोताना मित्रसन्मुख जोश्ने कह्यु के तारीपासे कई वस्तु ? // 7 // सारे ते पण बोल्यो के घुघरीविना बीजं कई यहीं मारीपासे नथी, त्यारे कुमार बोल्यो के तेज मने श्राप ? केमके मारे तेनुज प्रयोजन . // 7 // त्यारे ते सागर नाम ना मित्रे कुमारना हाथमां घुघरी थापी, त्यारे तेने जोतांज नळखी कहाडवाथी कनकवती अ. त्यंत गजराटमां पमी. // 10 // ( कुमार बोल्यो के ) या कई वींगी नथी, परंतु घुघरी ने तं केम | P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036431
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages176
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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