SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 93
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ धम्मि- द्रायां / यदेवं वंचिता वयं // 27 // यं जिनप्रसादेन / सावितस्वप्रयोजना // नोगाप्या व्यस्मरसाथ जन्मांतरितेव निजं वचः // 20 // नक्तिः दूरेऽस्तु चै यस्य / कुसुमागरणादिका / / गतरोगेव | वैद्यस्य / नासौ नतिमपि व्यधात् / / 25 // यद्यपि प्रतिपद्येयं / पुत्रीति परिणायिता // तथापि पि. तृवत् किंचि-जिंदणीया प्रमादिनी // 30 // न्यरुंचनथ संतृय / ते तस्या गर्नसंग // लमतः पचमा दुर्निग्रहाः पंचग्रहा श्व / / 31 / / तदस्तु नास्ति लोकेऽपि / नासीयन्मंदिरे तयोः // एकपटी नीवमी ! के जेणीए आपणने भावी रीते उग्या. // 27 // जिनेश्वरप्रचुनी कृपायी पोतानं कार्य साध्याबाद जोगोनी प्राप्तिथी जाणे जन्मांतरमां गश् होय नहि तेम ते पोतार्नु वचन विस री ग. // 20 // जिनमंदिरनी पुष्पा वृषण आदिकथी शक्ति तो दूर रही, परंतु रोग गया. बाद जेम वैद्यने तेम तेणी प्रभुप्रतिमाने नमस्कार पण करती नथी. // 25 // जो के तेणीने प्रापणे पुत्री जाणीने परणावी , तो पण हवे प्रमादी थवाथी पितानीपेठे तेणीने कइंक शिदा पण आपवी जोश्ये. // 30 // एम विचारी लामथी पांचमा (एवा) पांच दुष्टाहोनीपेठे तेनए एकठा थने तेणीनी गर्नोत्पत्ति रोकी राखी. // 31 // मनने थानंदकारी एवा एक बालकनी क्रीडाना | P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036430
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages173
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy