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________________ धम्मि- // 7 // तृणानीव सरस्वत्या-स्तरत्युपरि रयः // हृदयग्राहिणस्तस्याः / सुवंश्या एव केचन / / माई // 5 // नूनमेवंविधोक्तीनां / जाजनं सा गुणास्पदं // अस्यामपि न रज्ये चेतन्मत्तः कोऽपरः पशुः // 6 // इति विज्ञाय पुत्रस्या-जिप्रायं तत्कृते कृती // सुगद्रां प्रीतिपूरेण / समुद्रः प्रत्यपद्यत // // श्रुते तस्मिन् व्यतिकरे / सागरो मुमुदेतरां // मन्यमाना सुनद्रापि / फलितं स्वम. पासे था कुदरती बे लोचन शिवाय त्रीजु पण कक लोचन होवु जोश्ये, के जेथी ते बीजानने अगम्य एवा पण अर्थाने जो शके . // 4 // घासनीपेठे सरस्वतीन) ( ते नामनी न. दीनी) उपर उपर तो घणा तरे थे, परंतु तेणीना सारने (तलीयांने ) ग्रहण करनारा तो कोश्क कुलीनज ( नत्तम जातिना वांसज ) होश् शके . // 5 // मांटे खरेखर एवी रीतनां वचनोना जाजनसरखी ते सुजदा गुणोना स्थानरूप में, अने हवे था सुजडामां पण जो हं खु. शी न थनं तो पनी माराथी बीजो कयो पशुसमान ? // 6 // हवे एवी रीतनो पुत्रनों जिप्राय जाणीने कृतार्थ थयेला समुद्रदत्ते हर्षपूर्वक तेनेमाटे सुनसानो स्वीकार को. // 7 // | ते वृत्तांत सांभलवाथी सागरशेठ पण अत्यंत खुशी थयो, अने सुनद्रा पण पोतानो मनोरय फ. Jun Gun Aaradhak Trust PP.AC.Gunratnasuri M.S.
SR No.036430
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages173
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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