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________________ धम्मि- रश्रेष्टिनः पुरः // प्रश्नानि च सुगमायां / जनं दत्तश्रुतौ जगुः // 15 // एतज्ज्ञातम नृत् पूर्व / हा माई सख्यः किं चविष्यति // इति पूत्कुर्वती बाला / व्यालात्तेव रुरोद सा // 16 / / तदा तैराई तैर्देवै वितेने व्योमनीति वाक // मा शोचीः पुत्रि तिष्टाम-स्तव संनिहिता वयं / / 99 // तत्सांनिध्या 71 दनध्यायं / विषादस्य विधाय सा / / सद्यः प्रश्नोत्तरश्लोकं / पूर्वाधीतमिवापत् / / 90 // निश्चलस्ने. हलो धर्म-श्चित्प्रकाशो निरंतरः // विद्या सर्वोत्तमो लाजः / शीलं रूपमविस्रसं / / 7 / लिखि तेनए भावीने सागरशेठने विवाहना विघ्न संबंधि वृत्तांत कह्यो, तथा ते प्रश्नो पण कयां, तेव. खते त्यां गुप्त रहेली सुनदाए पण ते सघर्चा सांजव्यु. // 75 // हे सखीन में तो पहेलेथीज या. म थवानुं जाण्युं हतुं, हवे शुं थशे? एम पोकार करती ते बालिका जाणे अजगरे पकमी होय नहि तेम रडवा लागी. // 76 // ते वखते ते जैनी देवोए एवी रीतनी अाकाशवाणी करी के, हे पत्रि! तुं शोक कर नहि, अमो तने सहाय करनारा तैयार नन्ना जीये. // 7 // हवे तेन. ना सहायथी शोक तजीने जाणे पहेलेथीज जणी राख्यो होय नहि तेम तुरत प्रश्नोना उत्तरनो | श्लोक ते बोली के, // 9 // निश्चल स्नेहवाळो धर्म , निरंतर प्रकाशवाळू झान , विद्या एस. P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036430
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages173
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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