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________________ धम्मि- ग्रहतु-व्रतं वैराग्यशालिनौ // 65 / / त्रयोऽपि तपसा तेऽग्नि-त्रयीतुलिततेजसः // दग्धकर्मेधनाः मा काले / लेनिरे परमं पदं / / 66 / / एवं तात कृतातंकं / श्रुत्वा वृत्तं कुयोषितां // अपरीय कं थं कन्या-माद्रियंते महाधियः // 67 // निश्चलः स्नेहलः कोऽत्र / कः प्रकाशो निरंतरः॥को वा | सर्वोत्तमो लाभः / किं च रूपमविलसं // 6 // एवं प्रश्नानि चत्वारि / या तु प्रत्युत्तरिष्यति // तात | सा तत्वतः प्राण-वाजा मे जाविष्यति // 6 // // इत्यस्य निश्चयं मत्वा / समुषो न्यगदत्तरां // रो नथी थतो? // 64 // एवी रीते मुनिए प्रतिबोध थाप्याथी तेज बन्ने पण वैराग्यथी शोलता. थका तृणनी माफक संपदा तजीने दीदा लेता हवा. // 65 // परी अमित्रयसरखा तेजवाळा तेन सणे कर्मरूपी काष्टो बाळीने मोक्षपद पाम्या. // 66 // एवी रीतनुं दुराचारी स्त्रीनुं जयंकर वृत्तांत सांगळीने हे पिताजी ! बुध्विानो परीक्षा कर्याविना कन्यानो केम स्वीकार करे? // 67 // अहीं निश्चल स्नेही कोण ? निरंतर प्रकाश कयो ? तथा सर्वोत्तम लान कयो? अने अविनश्वर रूपक यु? // 17 // हे पिताजी ! एवी रीतनां मारा था चार प्रश्नोनो जे उत्तर श्रापशे ते तत्वथी मारी / प्राणवल्वाना स्त्री थशे. // .67 // एवी रीतनो तेनो निश्चय जाणीने समुद्रदत्ते कहां के, हे वत्स | P.P.AC.Gunratnasuri M.S. . Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036430
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages173
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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