________________ धम्मि- धौ / धनार्जनाशाकल्लोलै-रुतैया॑नशे जगत् // 20 // अथागत्य निजं धाम / पितरं स व्यः / साई जिझपत // दूरदेशांतरं गंतु-कामः कामनया श्रियः // 21 / / वारितोऽपीति पित्रासौ / न जहौ निजमाग्रहं / / भृशायंते निषिऽर्थे / युवानो ह्यातुरा व // 22 // संगृह्म भांमसारं स / लक्ष्मीलाजायलमकः // जवाहिवाहकारी वा-ऽस्तोकं लोकममेलयत् / / 23 // सुरूपा तमथैकांते / कांन होय तो तेना हाथपग अपयशरूपी वेलमीना अंकुरासमान जाणवा. // 15 // एवी रीतनां विकटपोरूपी तोफानी पवनथी तेनो मनरूपी समुऽ दोगायमान थयो, तथा तेमां नरळेलां ध. न कमावानी अाशारूपी मोजांन समस्त जगतमां व्यापी गया. // 20 // हवे ते पोताने घेर था. वीने पिताने कहेवा लाग्यो के हे पिताजी धन कमावानी श्वायी हुं दूरदेशांतरमां जवा चाहं बु. // 21 // त्यारे पिताए निवार्या उतां पण तेणे पोतानो आग्रह गोड्यो नही, केमके युवको प्रा. तुरनी पेठे निषेधेबु कार्य करवाने वधारे हठ करे . // 25 // विवाह करनारनीपेते धन मेळ. ववामाटे थातुर बनीने सर्व सरंजाम एकठो करीने तेणे त्यां घणा लोकोने नेगा कर्या. // 13 // हवे सुरूपाए तेने एकांत मनोज्ञ वचनथी कह्यु के, हे स्वामी ! हुं पण खरेखर तमारी साथे प्रा.) P.P. Ac. Gunratnasur M.S. Jun Gun Aaradhak Trust