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________________ धम्मि- हिताहितविमर्शोऽयं / केवलं दुर्यशश्निदे // फलंति प्राक्कृतान्येव / कर्माण्यत्र शरीरिणां // 35 // सार्थ विचारपूर्व कुर्वतु / कार्यमार्यधियो जनाः // दैवमेवानुवर्तते / फलकाले तु सिध्यः॥ 40 // दैवा. | यत्ताः श्रियः सर्वा / नूनं गौणो गुणाग्रहः // कुविंदाः पतिता गर्ने / शश्वजुणरता अपि // 1 // 157 व्यवहारविदे सूनो-र्यन्मया कर्म निर्ममे // तददंगदाहाय / घिगिमा वामतां विधेः / / 42 // यः | शास्त्रे पारगः प्रेदा-पूर्वकारी कलास्पदं // सोऽपि लीलायितं वेत्ति / न धातुः स श दिजः // 43 // | वचनो बोलीने घा नपर खार नाखो नहि. // 30 // वळी हित अहितनो या विचार केवल अ. पयशनो नाश करनार बे, बाकी तो अहीं प्राणीनां पूर्वे करेलां कर्मोज फळे जे. // 30 // बुघिवान माणसो भले विचारपूर्वक कार्य करो, परंतु फलसमये कार्यनी सिधि तो कर्मने अनुसा रेज थाय . // 40 // सर्व संपदान देवने बाधीन के गुणोनुं ग्रहण तो तेमां खरेखर गौणरूप बे, वणकरो जो के हमेशां गुणोमांज ( तंतुमांज ) रक्त , तां तेन खामामां पडेला . // // 41 // पुत्रने दुनियाना व्यवहारथी वाकेफ थवामाटे में जे कार्य कयु, ते नलर्ट ( मारां) श. / रीरने बाळ्नारुं थयु, माटे विधाताना या विपरीतपणाने धिक्कार बे. // 42 // जे शास्त्रोनो पारं. P.P.AC.Gunratnasur M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036430
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages173
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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