________________ ' धम्मि- वेश्यावश्योऽजवत्सोऽपि / विग्धिगिंद्रियचापलं // 6 // यो नाभुंक्त पुरा पित्रो-प्रणम्य क्रमां- मार्थ | बुजे // तच्बुधिमपि नाप्रादी-देश धिग् रमणीरसं / / 65 // योऽनृत्याग निर्निमेषादो / मुनी. नां मुखवीकणे // तन्नामास्य शिरःशूलं / चक्रे धिक्कामवामतां // 70 // धर्म्यश्रुतैनवनवै-यन्मनः 143 प्रागवास्यत / तऽ गणिकावाक्य-धिग्यौवन विम्वनां / / 71 // यैर्वयस्यैः समं प्रीतिः / प्रागदि. नाम सांगळ्वाथी पण कंटाळतो हतो, ते पण वेश्याने वश थर गयो, माटे धिक्कार ने इंजिनी चपलताने. // 60 // जे पूर्व मातपिताना चरणकमलोने नम्याविना नोजन पण करतो नहि, ते श्रा बाजे तेजना खुशीखबर पण पूबतो नथी, माटे धिक्कार ने स्त्रीरसने. // 65 // जे पूर्व मु. निनु मुख जोवामां निमेषरहित चक्षुनवाळो हतो, तेने बाजे ते मुनिनु नाम पण मस्तक मां शूल नपजावनाएं लागे , माटे धिक्कार ने कामना विपरीतपणाने. / / 70 // जेना मनमां पृ. र्वे नवां नवां धर्मशास्त्रोनां वचनो वसी रह्यां हतां, ते मन याजे वेश्याना वाक्योए रोधी राख्यं. | माटे धिक्कार ने यौवननी विनंबनाने. // 71 // जे मित्रोसाथे पूर्व जरा पण विरह न सहन थप के एवी प्रीति हती, तेजनी मित्राश्ने बाजे ते पोताना नोगोना विघ्नरूप मानवा लाग्यो, मा. P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust