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________________ 134 देव, शास्त्र और गुरु प्रथम परिशिष्ट : प्रसिद्ध दि. जैन शास्त्रकार आचार्य और शास्त्र 135 शास्त्रकार-आचार्य शास्त्र समय, परिचयादि वसुनंदि प्रथम प्रतिष्ठासारसंग्रह, ई. ११-१२वीं शता.। कई आचार्य हैं। उपासकाचार आप्तमीमांसावृत्ति और जिनशतक-टीका अन्य (श्रावकाचार), वसुनंदि की है। उपसकाचार (उपासकाध्ययन) में मूलाचार-आचारवृत्ति कई नए तथ्यों का समावेश है। रामसेन ___ तत्त्वानुशासन ई. सन् ११वीं उत्तरार्ध। सेनगण के आचार्य। कई रामसेन हुए हैं। गणधरकीर्ति अध्यात्मतरंगिणी वि. सं. 1189 / गुजरातप्रदेशवासी। भट्टवोसरि आयज्ञान (स्वोपज्ञ ई. ११वीं शता. उत्तरार्ध। ज्योतिष और निमित्त संस्कृत आयश्री शास्त्र के वेत्ता। ये दामनन्दि के शिष्य थे। टीका सहित) उग्रादित्य कल्याणकारक वि. सं. 749 के बाद। आयुर्वेदवेत्ता। भावसेन त्रैविध प्रमाप्रमेय, ई. १२वीं शता. मध्य। मूलसंघ सेनगण। दो सिद्धान्तसार, अन्य आचार्य थे। अन्य ग्रन्थ- शाकटायन न्यायदीपिका व्याकरणटीका, कातन्त्ररूपमाला, न्यायसूर्यावलि, (धर्मभूषण से भिन्न), भुक्तिमुक्तिविचार, सप्तपदार्थी टीका। विश्वतत्त्व-प्रकाश नयसेन धर्मामृत, ई. १२वीं शता. पूर्वार्ध। धर्मामृत में कथा के कन्नड-व्याकरण माध्यम से धर्म का महत्त्व है। वीरनंदि आचारसार ई.१२वीं शता. मध्य। ये मेघचन्द्र-शिष्य थे। (सिद्धान्तचक्रवर्ती) मूलसंघ पुस्तकगच्छ और देशीयगण के थे। चन्द्रप्रभचरितकर्ता वीरनंदि (अभयनंदिशिष्य) से ये भिन्न हैं। परमागमसार, ई. 13 शता, उत्तरार्ध। डा. ज्योति-भूषण ने सत्रह आस्रवत्रिभङ्गी, श्रुतमुनि गिनाए हैं। गोम्मटसार का प्रभाव है। भावत्रिभंगी हस्तिमल्ल विक्रान्तकौरव, ई. 1161-1181 / प्रसिद्ध दिगम्बर जैन मैथिलीकल्याण, संस्कृत नाट्यकार। ये प्रारम्भ में वत्स्यगोत्रीय अञ्जनापवनञ्जय, दक्षिणभारतीय ब्राह्मण थे। अन्य रचनायें भी हैं। मुभद्रानाटिका, ये सेनसंघ के आचार्य रहे हैं। आदिपुगण, आदि शास्त्रकार-आचार्य शास्त्र समय, परिचयादि माघनंदि शास्त्रसारसमुच्चय ई. १२वीं शता. उत्तरार्ध। इस नाम के तेरह आचार्य हैं। वज्रनन्दि नवस्तोत्र पूज्यपाद से परवर्ती। मल्लिषेण प्रशस्ति में उल्लेख है। महासेन द्वितीय सुलोचना कथा ई.८-९ शता.। जिनसेन प्रथम के हरिवंश पुराण में उल्लेख है। सुमतिदेव सुमतिसप्तक 7-8 शता.। मल्लिषेणप्रशस्ति में उल्लेख है। पद्मसिंह मुनि ज्ञानसार वि. सं. 1086 / प्राकृत भाषाविज्ञ। माधवचन्द्र त्रैविध त्रिलोकसार ई. सन् 975-1000 / नेमिचन्द्र सिद्धान्तसंस्कृत टीका चक्रवर्ती के शिष्य। इस नाम के 10-11 विद्वानों के उल्लेख हैं। नयनन्दि सुदंसणचरिउ, वि. सं. 11-12 शताब्दी। सयलविहि विहाण-कव्व श्रुतमुनि (घ) परम्परा-पोषकाचार्य बृहद् प्रभाचन्द्र तत्त्वार्थसूत्र समय अज्ञात। 'अर्हद्-प्रवचन' भी प्रभाचन्द्र के (उमास्वामी से भिन्न) नाम से मिलता है। ये प्रमेयकमलमार्तण्डकार से भिन्न हैं। 1. अन्य परम्परा-पोषकाचार्य भट्टारक पद्मनंदि (श्रावकाचार-सारोद्धार, वर्धमानचरित आदि), भट्टारकसकलकीर्ति (शान्तिनाथ चरित, समाधिमरणोत्साह-दीपक आदि 37 ग्रन्थ), भट्टारक भुवनकीर्ति (जीवन्धररास आदि), ब्रह्मजिनदास (जम्बूस्वामिचरित आदि 65 ग्रन्थ),सोमकीर्ति (प्रद्युम्नचरित आदि 8 ग्रन्थ), ज्ञानभूषण (तत्त्वज्ञानतरंगिणी आदि 16 ग्रन्थ), भट्टारक विजयकीर्ति (धर्मप्रचारक), भट्टारक विद्यानंदि (सुदर्शन चरित), भट्टारक मल्लिभूषण (धर्मप्रचारक), वीरचन्द्र (वीरविलासफाग आदि), सुमतकीर्ति (कर्मकाण्डटीका, पंचसंग्रह टीका आदि), भट्टारक जिनचन्द्र (सिद्धान्तसार, जिनचतुर्विंशतिस्तोत्र), भट्टारक प्रभाचन्द्र (ग्रन्थजीर्णोद्धारक), भट्टारक जिनसेन द्वितीय (नेमिनाथरास), ब्रह्मजीवन्धर (गुणस्थानवेलि आदि 12 ग्रन्थ), यश-कीर्ति (पाण्डवपुराण आदि), शुभकीर्ति (शान्तिनाथ चरित), गुणचन्द्र (अनन्तनाथ पूजा आदि), मलयकीर्ति, श्रुतकीर्ति (हरिवंशपुराण आदि), धर्मकीर्ति भट्टारक (पद्मपुराण, हरिवंश पुराण), रत्नकीर्ति या
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
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