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________________ प्रथम परिशिष्ट : प्रसिद्ध दि. जैन शास्त्रकार आचार्य और शास्त्र 133 132 देव, शास्त्र और गुरु शास्त्रकार-आचार्य शास्त्र समय, परिचयादि न्यायकुमुदचन्द्र शाकटायन-न्यास (शाकटायन व्याकरण टीका), (लघीयलय टीका), शब्दाम्भोजभास्कर (जैनेन्द्र व्याकरण टीका), तत्त्वार्थवृत्तिपदविवरण प्रवचनसार-सरोजभास्कर (प्रवचनसार टीका), (सर्वार्थसिद्धि-टीका), गद्यकथाकोष, आत्मानुशासनटीका, महापुराण क्रियाकलापटीका टिप्पण, रत्नकरण्डश्रावकाचारटीका, समाधितन्त्र टीका। जुगल किशोर मुख्तार अंतिम दो को अन्य प्रभाचन्द्रकृत मानते हैं। लघु अनन्तवीर्य प्रमेयरत्नमाला वि. सं. 12 वी शता. पूर्वार्द्ध। जैनन्याय (परीक्षामुख टीका) ग्रन्थकार। वीरनन्दि चन्द्रप्रभचरित- ई. सन् 950-999 / मनोभावों का सजीव महाकाव्य चित्रण करने में सिद्धहस्त महाकवि। महासेनाचार्य प्रद्युम्नचरित- ई. सन् 10 वीं शता. उत्तरार्ध। लाटवर्गट संघ महाकाव्य के आचार्य। यह काष्ठासंघ की शाखा है। हरिषेण बृहत् कथाकोश ई. 931 / इस नाम के कई आचार्य हैं। सोमदेव सरि नीतिवाक्यामृत, ई. 959 / तार्किक, रजनीतिज्ञ, धर्माचार्य तथा यशस्तिलकचम्पू, साहित्यकार। इनका यशस्तिलकचम्पू मध्यकालीन अध्यात्मतरंगिणी भारतीय संस्कृति के इतिहास का अपूर्व (योगमार्ग) स्रोत है। वादिराज पार्श्वनाथचरित, ई. सन् ११वीं शता. / इनका कुष्ठ रोग एकीभाव यशोधरचरित, स्तोत्र से दूर हो गया था, ऐसा उल्लेख मिलता एकीभावस्तोत्र, है। द्रविड़ (द्रमिल) संघ के आचार्य थे। दार्शनिक, न्यायविनिश्चय- वादिविजेता और महाकवि थे। इनकी विवरण, षट्तर्कषण्मुख आदि उपाधियाँ थीं। प्रमाणनिर्णय पद्मनंदि प्रथम जंबूद्वीवपण्णत्ति, ई. सन्. १०वीं शता. / इस नाम के कई आचार्यों धम्मरसायण, के उल्लेख हैं। आचार्य कुन्दकुन्द का भी एक नाम प्राकृतपंचसंग्रहवृत्ति पद्मनंदि मिलता है। ये सिद्धान्त-शास्त्रज्ञ थे। पद्मनंदि द्वितीय पद्मनंदि पंचविंशतिका ई. सन् ११वीं शता. / लोकप्रिय रचना रही है जिसमें 26 विषय हैं। शास्त्रकार-आचार्य शास्त्र समय, परिचयादि जयसेन प्रथम धर्मरत्नाकर वि.सं.१०५५/लाडवागड संघ के थे। जयसेन द्वितीय समयसार टीका, ई. 11-12 शता.। इन टीकाओं का नाम है प्रवचनसार टीका, 'तात्पर्यवृत्ति'। शैली और अर्थ की दृष्टि से ये पंचास्तिकाय टीका टीकायें अमृतचन्द्राचार्य से भिन्न हैं। पाप्रभ नियमसार- ई. 12 वीं शता.। पं. नाथूराम प्रेमी इन्हें मलधारिदेव तात्पर्यवृत्तिटीका, पंचविंशति के कर्ता पद्मनंदि से अभिन्न मानते हैं। पार्श्वनाथस्तोत्र शुभचन्द्र ज्ञानार्णव - वि.सं. 11 वीं शता. / इस नाम के कई आचार्य है। (योगप्रदीप) अनन्तकीर्ति सर्वज्ञसिद्धि ई. ९वीं शता. उत्तरार्ध। कई आचार्य हैं। (बृहत् और लघु) मल्लिषेण नागकुमारकाव्य, ई. ११वीं शता. / कवि और मन्त्रवादी। उभय महापुराण, भाषाकविचक्रवर्ती थे। अन्य रचनायें- सर भैरवपद्यावतीकल्प स्वतीमन्त्रकल्प, ज्वालिनीकल्प, कामचाण्डालीकल्प। इन्द्रनन्दि प्रथम ज्वालमालिनीकल्प ई.१० वी शता. पूर्वार्द्ध। मन्त्रशास्त्रज्ञ। इस नाम के कई आचार्य हैं। जिनचन्द्र सिद्धान्तसार ई. 11-12 शता. / सिद्धान्तसार पर ज्ञानभूषण का भाष्य है। श्रीधर गणितसार ई. 8-9 शता. संभावित है। कई विद्वान् हैं। (विंशतिका), ज्योतिष और गणित के विद्वान्। अन्य रचना हैज्योतिर्ज्ञानविधि, जातकतिलक (कन्नड में)। बीजगणित दुर्गदेव रिष्टसमुच्चय, ई. सन् ११वीं शता.। श्वेताम्बर और दिगम्बर अर्धकाण्ड, साहित्य में इस नाम के तीन आचार्यों का उल्लेख मरणकण्डिका, है। आगम और तर्कशास्त्र के भी ज्ञाता थे। मन्त्रमहोदधि मुनि पद्मकीर्ति पासणाहचरिउ शक सं. 999 / जिनसेन गुरु थे। इन्द्रनन्दि द्वितीय छेदपिण्ड ई.११वीं शता. 1 कई आचार्य हैं। एक श्रुतावतार के कर्ता इन्द्रनंदि हैं। . +
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
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