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________________ ( २३८ ) 1 के शब्द सुनने से उससमय याधोओंकी भी वही दशा होगई रोषमें आकर वे भी इधर उधर घूमने लगे और एक दूसरे पर प्रहार करने लगे । दोनों सेनाका घोर संग्राम साक्षात् महामागरकी उपमाको धारण करता था। क्योंकि महासागर जैसा पर्वतों से व्याप्त रहता है । संग्रामभी आहत हो पृथ्वीपर गिरेहुवे हारूपी पर्वतों से व्याप्त था । महासागर जैसा तरंग युक्त होता है, संग्रामभी चंचल अश्वरूपी तरंग युक्त था । महासागर में जिसप्रकार महामत्स्य रहते हैं संग्राम में भी पैनी तलवारों से कटे हुवे मनुष्यों के मुखरूपी मत्स्य थे । महासागर जैसा जल पूर्ण रहता है । संग्राम भी घावोंसे निकलते हुये रक्तरूपी जल से पूर्ण था । महासागर जसा मणिरत्नों से व्याप्त रहता है संग्राम भी मृतयोधाओं के दांत मणिरत्नोंने व्याप्त था । महासागर में जैसे भयंकर शब्द होते हैं । संग्राम में भी हाथियों के चीत्कार रूपी शब्द थे । महासागर जिसप्रकार वालू सहित होता है । संग्राम भी पिसी हुई हड्डी रूपी वालू सहित था। महासमुद्र जैसा कीचड व्याप्त रहता है संग्राम भी मांसरूपी कीचडसे व्याप्त था । महासागरमें जैसे मेढक और कछुवे रहते हैं संग्राम में भी वैसेही कटे हुवे घोडों के पैर मेढक और हाथियों के पैर कछुवे थे । महासागर जैसा खंड पर्वत युक्त होता है । संग्राम भी मृतशरीरोंके ढेररूप खंडपर्वतयुक्त था । महासागर में जैसे सर्प रहते हैं संग्राम में भी कटी हुई हाथियोंकी पूंछे सर्प थीं । महासागर Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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