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________________ ( १५७ ) ज्योंही उसने पट सामने रख लेखनी हाथमें ली । त्योंही विना परिश्रमके आपसे आप पट पर चित्र खिंच गया । चित्रको अनायास पट पर अंकित देख भरतको अति प्रसन्नता हुई । अपने वरको सिद्ध समझ वह अयोध्या से निकल पड़ा । एवं अनेक देश पुर ग्रामोंमें अपने चित्रकौशलको दिखाता हुवा, कठिन भी चित्रोंको अनायास खींचता हुवा, अपने चित्रकर्म चातुर्य से बड़े २ राजाओं को भी मोहित करता हुवा वह भरत आनंद पूर्वक समस्त पृथ्वीमंडल पर घूमने लगा । अनेक पुर एवं ग्रामोंसे शोभित, वन उपवनोंसे मंडित, भांति २ के धान्योंसे विराजित, एक सिंधु देश है । सिंधुदेश में अनुपम राजधानी विशाला पुरी है । विशाला पुररीके स्वामी नीतिपूर्वक प्रजाका पालन करनवाले अनेक विद्वानोंसे मंडित महाराज चेटक थे । महाराज चेटककी पट रानीका नाम सुभद्रा था। जोकि मृगनयनी चंद्रमुखी कृशांगी और कठिन एवं उन्नतस्तनोंको धारण करने वाली थी । राजा चेटक के पटरानी सुभद्रा से उत्पन्न मनोहरा ? मृगावती २ वसुप्रभा ३ प्रभावती ४ ज्येष्ठा ५ चेलना ६ चंदना ७ ये सात कन्यायें थीं। ये सातो ही कन्या अति मनोहर थीं। भले प्रकार जैन धर्मकी भक्त थीं । स्त्रियों के प्रधान २ गुणोंसे मंडित एवं उत्तम थीं । सात कन्याओं के रूप सौन्दर्य देख राजा चेटक एवं महाराणी सुभद्रा अति प्रसन्न रहते थे । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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