SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 179
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( १५८ ) कन्यायेंभी भांति भांतिके कलाकौशलोंसे पिता माताको सदा संतुष्ट करती रहती थीं। कदाचित् भ्रमण करता करता चित्रकार भरत इसी विशाला नगरीमें जा पहुंचा । उसने सातो कन्याओंका शीघ्र ही चित्र अंकित किया । एवं उसे महाराज चेटककी सभामें जा हाजिर किया । और महाराजके पूछे जाने पर उसने अपना परिचय भी दे दिया । ____अति चतुरतासे पट पर अंकित कन्याओंका चित्र देख राजा चेटक अति प्रसन्न हुये । भरतकी चित्रविषयक कारीगारी देख महाराज बार वार भरतकी प्रशंसा करने लगे । और उचित पारितोषिक दे राज' चेटकने भरतको पूर्णतया सन्मानित भी किया । किसीसमय महाराजकी प्रसन्नताकेलिये भरतने उन सातो कन्याओंका चित्र राजद्वारमें अंकित कर दिया । और उसै भांति भांतिके रगोंसे रंगित कर अति मनोहर वना दिया । चित्रकी सुघड़ाई देख समस्त नगर निवसी उस चित्रको देखने आने लगे । और उन सात कन्याओंका वैसा ही चित्र नगर निवासियोंने अपने अपने द्वारोंपर भी खींच लिया। एवं कन्याओंके चित्रसे अपनेको धन्य समझने लगे । ___ संसारमें जो लोग सात माता कहकर पुकारते हैं । और उनकी भक्तिभावसे पूजा करते हैं। सो अन्य कोई सात Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy