SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 166
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मोहित भी है। तू उसके साथ आनंदसे भोगोंको भोग । तुझ सरीखी रूपवतीकेलिये संसारमें कोई चीज दुर्लभ नहीं । दूतीके ऐसे वचन सुन तो भद्राके मुहमें पानी आगया। उस मुर्खाने यह तो समझा नं.हं कि इस दुष्टवतांवसे क्या हानियां होंगी। वह शीघ्र ही वसंतके धर जानेकेलिये राजी होगई । तथा दाव पा किसीदिन वसंतके घर चली भी गई । और उसके साथ भोग विलास करने शुरू करदिये । व्यसनका चसका बुरा होता है । भद्राको व्यसनका चसका वुर। पड़गया । वह अपने भोले पतिको बातों में लगा प्रतिदिन वसंतके घर जाने लगी । वसंत पर अभिमान कर उसने अपने पतिका अपमान करना भी प्रारम्भ कर दिया। अनेकप्रकारकी कलह करनी भी उसने घरमें शुरू कर दी । और अपने सामने किसीको वह वड़ा भी नहीं समझने लगी। ____ भद्राका पति वलभद्र किसान था । कदाचित् भद्रा को कार्यवश खेत पर जाना पड़ा । दैवसे भद्राकी भैंट मुनि गुण सागरसे मार्गमें होगई । मुनि गुणसागरको अतिरूपवान्, सूर्यके समान तेजस्वी, युवा, एव अनेकगुणोंके भंडार देख भद्रा कामसे व्याकुल हो गई । कामके गाढ़ नशेमें आकर उसको यह भी न सूझा कि यह कोंन महात्मा है ! वह शीघ्र ही कामसे व्याकुल हो मुनिराजके सामने बैठि गई । और कामजन्य विकारोंको प्रकट करती हुई इसप्रकार कहने लगी। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy