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________________ ... संया संख्या २] शनि की दशा १७९ , पूछा- महाशय जी का स्थान कहाँ है ? क्या आप यहाँ खड़े हो गये और कहने लगे कि वासन्ती, इन्हें घूमने आये हैं ? प्रणाम करो। ___“जी नहीं, कुछ कार्य था। कल रात को तूफ़ान वासन्ती ने मस्तक झुकाकर वसु महोदय को प्रणाम आगया। पानी भी बरसने लगा। इससे जाने का साहस किया। उन्होंने भी उसके मस्तक पर हाथ रख कर श्राशीनहीं हुआ। सोचा कि रात्रि में कहीं कोई चोर-बदमाश न र्वाद दिया । अन्त में भाँजी को साथ में लेकर हरिनाथ मिल जायें । इससे यहीं पर रुक गया।" बाबू दत्त बाबू के घर से चल पड़े। ___ "अाज यदि मेरे ही यहाँ भोजन करने की कृपा दोपहर को दत्त-बहू हरिनाथ बाबू के द्वार पर जाकर करते !" ___ खड़ी हुई । उस समय उन्हें कोई दिखाई नहीं पड़ा। इससे - वसु महोदय ने ज़रा-सा हँसकर कहा-अाज अभी वे पुकारने लगीं-क्यों रे वासन्ती, कहाँ चले गये तुम ही मैं चला जाऊँगा, अन्यथा आपके यहाँ भोजन करने में लोग ? हरिनाथ कहाँ हैं ? मुझे कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु इसके लिए आपके मन वासन्ती उस समय चौके से बहुत-से जूठे बर्तन लिये को ज़रा भी कष्ट न होना चाहिए। मैं प्रायः इस ओर से हुए आ रही थी। दत्त-बहू को देखकर उसने कहा-- होकर आता-जाता रहता हूँ। इस बार आने पर मैं अवश्य नानी जी, मामा सो रहे हैं । बैठो, मैं उन्हें जगाये देती हूँ। "आपके यहाँ ठहरूँगा। मस्तक पर से बर्तनों का बोझ उतारकर वासन्ती ... यह बात सुनकर विश्वनाथ ने कहा--माता जी ने रख दिया और लोटे के जल से हाथ धोकर तेल से सवेरे से ही उठकर आपके भोजन का प्रबन्ध कर रही हैं। भीगी हुई एक फटी-सी चटाई उसने बिछा दी । उसी पर रसोई तैयार होगई है। आप शीघ्र ही स्नान कर लीजिए। दत्त-बहू को बैठने को कहकर भीतर चली गई । क्षण यदि आप कुछ खाये बिना ही चले जायेंगे तो वे बहुत ही भर के बाद वासन्ती की मामी का स्वर सुनाई पड़ा। । दुःखी होंगी। वे पञ्चम स्वर से कह रही थीं-कहाँ की बला है ? यह तो विश्वनाथ की इस बात के उत्तर में वसु महोदय ने खोपड़ी खा गई ऐसी दोपहरी में मामा, मामा करके । क्या कहा-भैया, माता जी क्यों इतने सवेरे से ही मेरे लिए करेगी मामा का ? इससे किसी तरह पिंड भी नहीं छूटता कष्ट करने लगीं ? मैं प्रायः दो-तीन बजे तक भोजन किया कि शान्ति से रह सकती। करता हूँ। सन्ध्या-पूजा आदि से निवृत्त हुए बिना मैं भोजन बाहर से दत्त-बहू ने कहा-पिंड छुड़ाने का ही नहीं करता, और वह सब करने में बड़ा झगड़ा है। प्रबन्ध करने आई हूँ बहू । हरिनाथ को ज़रा-सा बुला दो। ___ विश्वनाथ ने कहा- इसमें क्या झगड़ा है ? मैं अभी दत्त-बहू का कण्ठस्वर सुनकर हरिनाथ बाबू बड़ी सब प्रबन्ध किये देता हूँ। आपको यहाँ किसी प्रकार का उतावली के साथ बाहर निकल आये । वे कहने लगे-- सङ्कोच करने की आवश्यकता नहीं है। कहो चाची, इस दोपहरी में कैसे निकल पड़ी हो ? क्या ... यह कहकर विश्वनाथ के चुप हो जाने पर राधामाधव कोई ख़ास बात है ? बाबू की ओर देखकर हरिनाथ बाबू ने कहा-महाशय जी, "बात अच्छी ही है । तुमसे एक बात कहने आई हूँ।" अब अाशा दीजिए । बाद को विश्वनाथ की ओर देखते वासन्ती उस समय बर्तन निकालने के लिए धीरे हुए उन्होंने कहा-विशू, वासन्ती को यहाँ बुला लाओ, धीरे चौके में जा रही थी। दत्त-बहू ने कहा---वासन्ती, यह वसु महाशय उसे देख लें। सब तू इस समय रहने दे । मैं अपनी नौकरानी को कहती विश्वनाथ भीतर गया और ज़रा ही देर में वासन्ती हूँ । वह आकर साफ़ कर देगी । तू मेरे पास आकर बैठ । को साथ में लेकर वह फिर लौट आया । वसु महोदय ने इसमें सन्देह नहीं कि इस बात से मामी बहुत रुष्ट वासन्ती का हाथ पकड़कर उसे अपने पास बैठाल लिया हो गई थीं, परन्तु दत्त-बहू के सामने मुँह से वे कुछ निकाल और सूर्य के उज्ज्वल प्रकाश में वे उसके मुरझाये हुए नहीं सकती थीं। चेहरे की ओर देखने लगे। तब हरिनाथ बाबू उठकर हरिनाथ बाबू ने पूछा--कौन-सी बात है चाची ? Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035249
Book TitleSaraswati 1937 01 to 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevidutta Shukla, Shreenath Sinh
PublisherIndian Press Limited
Publication Year1937
Total Pages640
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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