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________________ आगम (४५) [भाग-३९] "अनुयोगद्वार"-चूलिकासूत्र-२ (मूलं+वृत्तिः ) ....... मूलं [१५०] / गाथा ||११९-१२२|| ..... प्रत अनुयो वृत्तिः उपकमे प्रमाणद्वार सूत्रांक [१५०] ॥२३०॥ गाथा: दृष्टान्तत्रयेण दिग्मात्रदर्शनमेव कृतं, यावता यत्किमपि जीवादि वस्त्वस्ति तत्र सर्वत्र नयविचारः प्रवर्तते मलधा-18| इत्यलं बहुजल्पितेनेति ।। १४८ ॥ इतः क्रमप्राप्त समाप्रमाणं विवरीपुराहरीया से किं तं संखप्पमाणे ?, २ अट्रविहे पण्णत्ते, तंजहा-नामसंखा ठवणसंखा दव्वसंखा ओवम्मसंखा परिमाणसंखा जाणणासंखा गणणासंखा भावसंखा । से किं तं नामसंखा ?, २ जस्स णं जीवस्स वा जाव से तं नामसंखा । से किं तं ठवणसंखा?, २ जपणं कट्रकम्मे वा पोत्थकम्मे वा जाव से तं ठवणसंखा । नामठवणाणं को पइविसेसो?, नाम [पाएणं] आवकहियं ठवणा इत्तरिया वा होज्जा आवकहिया वा होजा। से किं तं व्यसंखा ?, २ दुविहा पण्णत्ता, तंजहा-आगमओ य नोआगमओ य, जाव से किं तं जाणयसरीरभविअसरीरवइरित्ता दव्वसंखा ?, २तिविहा पण्णत्ता, तंजहाएगभविए बद्धाउए अभिमुहणामगोत्ते अ। एगभविए णं भंते! एगभविएत्ति कालओ केवच्चिर होइ ?, जहणणेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं पुव्वकोडी, बद्धाउए णं भंते ! ||--|| दीप अनुक्रम || २३०॥ [३११ -३१७] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...आगमसूत्र-[४५] चूलिकासूत्र-[२] अनुयोगद्वार मूलं एवं हेमचन्द्रसूरि-रचिता वृत्ति: अत्र मुद्रणदोषात् सूत्रक्रमांक १४९ स्थाने सूत्रक्रमांक १५०' इति मुद्रितं अथ 'संख्या' विषयक प्ररुपणा क्रियते ~471~
SR No.035039
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 39 Anuyogdwar Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages560
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_anuyogdwar
File Size129 MB
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