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________________ आगम [भाग-३४] “दशवैकालिक”- मूलसूत्र-३ (मूलं+नियुक्ति:+|भाष्य+वृत्ति:) अध्ययनं [५], उद्देशक [-], मूलं [१५...] / गाथा ||२८...|| नियुक्ति : [२३५-२४४], भाष्यं [६२] (४२) दशवैका० हारि-वृत्तिः ५पिण्डैषणाध्य० प्रत ॥१६१॥ सूत्रांक ||२८..|| नामंठवणापिंडो दब्बे भावे अ होइ नायब्वो । गुडओयणाइ दब्वे भावे कोहाइया चउरो ।। २३५॥ पिडि संघाए जम्हा ते उद्या संघया य संसारे । संघाययंति जीवं कम्मेणट्टप्पगारेण ॥ २३६ ॥ दव्वेसणा उ तिविहा सचित्ताचित्तमीसदव्वाणं । दुपयचउप्पयअपया नरगयकरिसावणदुमाणं ।। २३७ ॥ भावेसणा उ दुविहा पसत्य अपसत्थगा य नायब्बा । नाणाईण पसस्था अपसत्था कोहमाईणं ।। २३८ ।। भावस्सुवगारित्ता एवं दवेसणाइ अहिगारो । तीइ पुण अत्थजुत्ती वत्तव्वा पिंडनिम्जुत्ती ।। २३९ ।। पिण्डेसणा य सव्या संखेवेगोयरइ नवसु कोडीसु । न हणइ न पयइ न किणइ कारावणअणुमईहि नव ।। २४० ॥ सा नबहा दुह कीरइ उग्गमकोडी विसोहिकोडी अ । छसु पढमा ओयरइ कीयतियम्मी विसोही 3 ।। २४१ ॥ कोडीकरणं दुविहं उग्गमकोडी विसोहिकोडी अ । उग्गमकोडी छकं विसोहिकोडी अणेगविहा ।। ६२॥ भाष्यम् ।। कम्मुरेसिअचरिमतिग पूइयं मीसचरिमपाहुडिआ । अझोयर अविसोही विसोहिकोडी भवे सेसा ॥ २४२ ॥ नव चेवहारसगा सत्तावीसा तहेब चउपना । नउई दो चेव सया सत्तरिआ हुँति कोडीणं ।। २४३ ॥ रोगाई मिच्छाई रागाई समणधम्म नाणाई । नव नव सत्तावीसा नव नउईए य गुणगारा ।। २४४ ॥ व्याख्या-पिण्डश्ऋषणा च 'द्विपदं नाम तु' द्विपदमेव विशेषाभिधानं 'तस्य' उक्तसंवन्धस्याध्ययनस्य ज्ञा १प्रतिभातीय प्रक्षिप्तप्राया, पदपटना वेषम् - रागद्वेषी नवनिर्मिथ्यात्वाज्ञानाविरतयो नवमिः रागद्वेषौ सप्तविंशस्या श्रमणधर्मवशर्क मामिः ज्ञानदर्शनधारि- आणि नवत्या च (एवं) गुणकाराः, 4%ARRORA दीप अनुक्रम [७५..] ॥१६ ॥१११ ॥ 'पिण्ड तथा 'एषणा' शब्दयो: निक्षेपा: ~333~
SR No.035034
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 34 Dashvaikalik Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages590
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_dashvaikalik
File Size139 MB
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