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________________ आगम (४१/१) [भाग-३२] “ओघनियुक्ति”- मूलसूत्र-२/१ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्ति:) मूलं [३१२] .. "नियुक्ति: [२०३] + भाष्यं [९४...] + प्रक्षेपं [१४... . पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[४१/१] मूलसूत्र-२/१ ओघनियुक्ति मूलं एवं द्रोणाचार्य-विरचिता वृत्ति: प्रत गाथांक नि/भा/प्र ||२०१|| ★ारः कार्यों, पदुताहमस्यापि पूज्यो येन मम शोभना संस्तारकभूर्दत्तेति ॥ जंइ रति आगया ताहे कालं न गेण्हति. निज-1* सीओ संगहणीओ य सणिों गुणेति, मा वेसित्थिदुगुंछिआदउ दोसा होहिंति, कायिकां मत्तएसु छटुंति उच्चारपि जय-19 णाए । जइ पुण कालभूमी पडिलेहिया साहे कालं गिण्हंति, यदि सुद्धो करेंति सज्झायं, अह न सुद्धो न पडिलेहिमा वाटू वसही ताहे निग्जुत्तीओ गुणेति, पढमपोरिसिं काऊणं बहुपडिपुण्णाए पोरिसीए गुरुसगासं गंतूण भणंति-इच्छामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए मत्थएण वंदामि, खमासमणा! बहुपडिपुण्णा पोरिसी, अणुजाणह राईसंथारयं, ताहे पढर्म काइआभूमि वचंति, ताहे जत्थ संथारगभूमी तत्थ वच्चंति, ताहे उघहिंमि उवओर्ग करेंता पमज्जता उवहीए दोरयं उच्छोडेंति, ताहे संथारगपट्टअं उत्तरपट्टयं च पडिलेहित्ता दोषि एगस्थ लाएत्ता ऊरुमि ठवेंति, साहे संथारगभूमि पडिलेहंति, ताहे संथारयं अच्छुरति सउत्तरपट्टे, तत्थ य लग्गा मुद्दपोत्तिआए उपरितं कार्य पमति, हेहिलं त्यहरणेणे, KASAMS दीप अनुक्रम [३१०] पदा राम्राषागतास्तदा कार्य न गृहम्ति नियुक्ती संग्रहिणीमा पानिर्गुणन्ति, मा वेश्यास्त्रीकुत्सितायो दोषा भूवन् , कायिकी मारकेषु म्युल्पजन्ति | हमारमपि यतनया । यदि पुनः काल मूमयः प्रतिले सितास्तदा काल एडम्सि, यदि शुदः कुर्वन्ति स्वाध्याय, अथ न शुद्धोग प्रतिरोशिता था वसतिस्तदा नियुक्तीगुणवन्ति । प्रथमा पौवर्षी कृत्वा बहुमतिपूर्णायो पौरुष्यो गुरुभकाशं गरवा भणन्ति-इच्छामि क्षमाश्रमणा वन्दितुं यापनीयया नैवेधिक्या मस्तकेन पन्दे, धमाश्रमण ! बहुमतिपूर्णा पौरुषी, अनुजानीत सविसंसारकं, लदानी प्रथम कायिकी भूमि व्रजन्ति, ततो यत्र संसारकभूमिस्तन्न मन्ति, सयोपचायुपयोग कुस्ता प्रमार्जवन्त उपदेवरकमुखछोटयन्ति, तदा संस्तारपहकमुत्तरपहर च प्रतिलिस्म भयेकन्न भावोरुणि स्थापयन्ति, तदा संस्तारकभूमि प्रतिलेखयन्सि, सदा संसारकमासृण्वन्ति खोचरपटक, तत्र पसमा मुखपत्रिकयोपरितनं कार्य प्रमार्जयन्ति, अपानं रजोहरणेन, ~ 176~
SR No.035032
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 32 Oghniryukti Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages472
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_oghniryukti
File Size99 MB
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