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________________ आगम (१८) “जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-७ (मूलं+वृत्ति:) वक्षस्कार [१], ----------------------- ------- मूलं [४] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र-[१८]उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्ति: प्रत सूत्रांक ४ सबरयणामया अच्छा जांच पडिरूबा, से केणत्थेणं भंते! एवं बुच्चइ-पउमवरयेश्या (२), गोयमा ! पउमवरवेइयाए सत्य तत्थ देसे तहिं तहिं वेड्यासु वेड्यावाहासु वेड्यापुडंतरेसु खंभेसु खंभवाहासु खंभसीसेसु खंभपुढंतरेसु सूईसु २॥ सूइमुहेसु सूईफलएसु सूईपुडंतरेसु पक्खेसु पक्खबाहासु बहूई उप्पलाई पउमाई कुमुयाई सुभगाई सोगंधियाई | पॉडरीयाई (महापोंडरीयाई) सयवत्ताई सहस्सवत्ताई सबरयणामयाई अच्छाई जाव पडिरूवाई महावासिकछत्तसमाणाई 1 पण्णत्ताई समणाउसो!, से एएणटेणं गोअमा! एवं बुच्चर-पउमवरवेइया २, अदुत्तरं च गं गोअमा! पउमवरवेइया | सासए णामधेजे पण्णत्ते । पचमवरवेइया णं भंते । किं सासया असासया, गोअमा! सिअ सासया सिअ असासया, (से केणडेणं०१,) गोमा दवडयाए सासया वण्णपज्जवेहिं गधपज्जवेहिं रसपजवेहिं फासपजवेहिं असासया, से तेणढेणं |एवं वुच्चइ-सिय सासया सिय असासया । पउमवरवेझ्या गंभंते! कालओ केवचिरं होइ, गोअमा! ण कयाइ णासी पण कयाइ ण भवइ ण कयाइ ण भविस्सइ भुविं च भवई य भविस्सइ य धुवा णियया सासया अक्खया अवया अव-|| 18| द्विआ णिचा" इति, अत्र व्याख्या-अनन्तरोक्कायाः पद्मवरवेदिकायाः वज्रमवा-वजरकमया नेमा, नेमा नाम भूमि-| 18 भागादूई निष्कामन्तः प्रदेशाः, वनशब्दस्य दीर्घत्वं प्राकृतत्वात् , एवमन्यत्रापि द्रष्टव्यं, तथा रिष्ठरत्नमयानि प्रतिष्ठा |नानि-मूलपादाः, तथा वैडूर्यरतमयाः स्तम्भाः, सुवर्णरूप्यमयानि फलकानि-पद्मवरयेदिकाङ्गभूतानि, लोहिताक्षरत-॥8॥ ॥४॥ मय्यः सूचय:-फलकद्वयस्थिरसम्बन्धकारिपादुकास्थानीयाः, वज्रमयाः सन्धयः-सन्धिमेलाः फलकानां, किमुक्कं भव-॥४॥ Dectstoecemesesecaceaeeकन अनुक्रम 032002020302929202 Sanelem ~56
SR No.035023
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 23 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages376
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size92 MB
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