SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 196
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगम (१८) ནྡྲིཡཱ ཎྜཱ - ཏྠལླཱ ཡྻ [२७-३२] "जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति" - उपांगसूत्र - ७ (मूलं + वृत्तिः) वक्षस्कार [२], मूलं [१९] + गाथा: पूज्य आगमोद्धारकश्री संशोधितः मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र [१८] उपांगसूत्र-[७] "जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति" मूलं एवं शांतिचन्द्र विहिता वृत्तिः श्रीजम्बूद्वीपशान्तिचन्द्री - या वृतिः ॥ ९२ ॥ परमाणू दुबिहे पण्णत्ते, तंजहा सुहुमे अ बाबहारिए अ, अर्णताणं सुमपरमाणुपुमालाणं समुदयसमिइसमागमेणं वावहारिए परमाणू णिफज्जइ तत्थ जो सत्यं कमइ - 'सत्येण सुतिक्खेणवि छेतुं मित्तुं च जं फिर ण सका । तं परमाणु सिद्धा वयंति आई पमाणाणं ||१|| बावहारिअपरमाणूणं समुदय समिश्समागमेणं सा एगा उस्सहसहिआइ वा सहिसहिआइ वा उद्धरेणू वा तसरेणूइ वा रहरेणूइ वा वालग्गेइ वा लिक्खाइ वा जूआइ वा जर्वमण्झेड वा उस्सेइंगुले इ वा, अट्ठ उस्सण्ड सहसण्डिया अट्ट सण्ड्सण्डिआओ सा एगा उद्धरेणू भट्ट उरेल सा पगा तसरेणू अड्ड तसरेणूओ सा एगा रहरेणू अह रहरेणूओ से एगे देवकुरूत्तरकुराण मणुस्साणं बाळयो अट्ठ देवकुरूत्तरकुराण मनुस्साण वाळग्गा से एगे हरिवासरम्मयवासाण मणुस्साणं वाग्गे एवं हेमकरणवयाण मणुस्साणं पुढविदेह अवर विदेहाणं मणुस्साण वालग्गा सा एगा लिक्खा अट्ट लिक्खाओ सा एगा जुआ जह जुजाओ से एगे जवम अट्ट जवमन्झा से एगे अंगुले एतेणं अंगुलप्पमाणेणं छ अंगुलाई पाओ वारस अंगुलाई विहत्थी चउबीसं अंगुलाई. रयणी अञ्चवालीसं अंगुलाई कुच्छी इण्णव अंगुलाई से एगे अक्खेइ वा दंडेद वा धणूइ वा जुगेइ वा मुसलेइ वा गालिओ वां एतेणं धणुष्पमाणेणं दो धणुसहस्साई गाड बत्तारि गाडआई जोअणं, एएणं जोअणप्पमाणेणं जे पले जोभणं आयामविक्संभेणं जोयणं उट्टे उचणं तं तिगुणं सविसेसं परिक्लेवेणं, से णं पड़े एगाहिअबेहियतेहिअ उकोसेणं सत्तर तपरूडाणं संमट्टे सणिचिए भरिए वालग्गकोडीणं । तेणं वालग्गा णो कुत्थेला णो परिविद्धंसेजा, जो अग्गी ढहेजा, णो वाए हरेला, णो पूइत्ताए हवमागच्छेजा, तो णं वासस २ एगमेगं बालगं अवहाय जावइएणं कालेणं से पल्ले खीणे णीरए जिले गिट्टिए भवइ से तं पलिजोषमें । एएस पहाणं कोडाकोडी इवेज दसगुणिआ। तं सागरोबमस्स उ एगस्स भये परीमाणं ॥ १ ॥ एएणं सागरोवमप्पमाणेणं चत्तारि F Ervale & Puna e Oly ~ 196 ~ Rotstarseenetnesses वक्षस्कारे पस्योपमप्ररूपणा सू. १९ ॥ ९२ ॥
SR No.035023
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 23 Jambudwippragyapti Mool evam Vrutti Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages376
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jambudwipapragnapti
File Size92 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy