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________________ आगम (१६) "सूर्यप्रज्ञप्ति” – उपांगसूत्र-५ (मूलं+वृत्ति:) प्राभृत [१३], -------------------- प्राभृतप्राभृत F], -------------------- मूलं [८१] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित..आगमसूत्र- [१६] उपांगसूत्र- [१] "सूर्यप्रज्ञप्ति मूलं एवं मलयगिरि-प्रणीता वृत्ति: प्रत सूत्रांक |सतभाग मंडलस्स, (ता) आइयेणं अद्धमासेणं चंदे कति मंडलाइं चरति ?,(ता) सोलस मंडलाइं चरति सोलस-11 |मंडलचारी तदा अवराई खलु दुवे अट्टकाई जाई चंदे केणइ असामण्णकाई सयमेव पविहित्ता २ चार चरति, कतराई खलु दुचे अट्टकाइं जाई चंदे केणइ असामण्णकाई सयमेव पविट्टित्तार चारं चरति ?, इमाई खलु ते थे| अहगाई जाई चंदे केणइ असामणगाई सयमेव पविद्वित्ता २ चारं चरति, तंजहा-निक्खममाणे चेवा अमावासंतेणं पविसमाणे चेव पुण्णिमासिंतेणं, एताई खलु दुवे अट्ठगाई जाई चंदे केणइ असामण्णगाई सयमेव पविद्वित्तार चारं चरइ, ता पढमायणगते चंदे दाहिणाते भागाते पविसमाणे सत्त अद्धमंडलाई जाइंग |चंदे दाहिणाले भागाए पविसमाणे चारं चरति, कतराई खलु ताई सत्त अद्धमंडलाई जाई चंदे दाहिणाते| भागाते पविसमाणे चारं चरति है, इमाई खलु ताई सत्त अमंडलाई जाई चंदे दाहिणाते भागाते पविसमाणे चारं चरति, तं०-विदिए अद्धमंडले चउत्थे अद्धमंडले छट्टे अमंडले अट्ठमे अद्धमंडले दसमे अहम-13 |डले यारसमे अहमंडले चउदसमे अद्धमंडले एताई खलु ताई सत्त अद्धमंडलाई जाई चंदे दाहिणाते भागाते पविसमाणे चार चरति, ता पढमायणगते चंदे उत्तराते भागाते पविसमाणे छ अद्धमंडलाइं तेरस य सत्तहिभागाइं अद्धमंडलस्स जाई चंदे उत्तराते भागाए पविसमाणे चारं चरति, कतराई खलु ताई छ अहमंड|लाई तेरस य सत्तविभागाई अद्धमंडलस्स जाई चंदे उत्तराते भागाते पविसमाणे चार चरति !, इमाई| | खलु ताई छ अहमंडलाई तेरस य सत्तद्विभागाई अद्धमंडलस्स जाई चंदे उत्तराए भागाते पविसमाणे चारं अनुक्रम [१०९] 5535 म ~483~
SR No.035021
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 21 Sooryapragyapti Mool evam Vrutti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages610
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_suryapragnapti
File Size132 MB
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