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________________ आगम (०२) [भाग-4] “सूत्रकृत्” - अंगसूत्र-२ (मूलं+नियुक्ति:+वृत्तिः ) श्रुतस्कंध [२.], अध्ययन [२], उद्देशक [-], मूलं [३९], नियुक्ति: [१६८] पूज्य आगमोद्धारकरी संशोधित: मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित......आगमसूत्र-०२], अंग सूत्र-[०२] "सुत्रकृत्" मूलं एवं शिलांकाचार्य-कृत् वृत्ति: प्रत सूत्रांक [३९] सूत्रकृताङ्गे २ श्रुतस्कन्धे शीलाकीयावृत्तिः ॥३३५॥ Reache edeese २ क्रियास्थानाध्य० मिश्रे धर्मपक्षे श्रावकव० . दीप अनुक्रम [६७१] इणमेव निग्गंधे पावयणे हिस्संकिया णिकंखिया निवितिगिच्छा लट्ठा गहियट्टा पुच्छियट्ठा विणिच्छि- यट्ठा अभिगयट्ठा अद्विमिंजपेम्माणुरागरत्ता अयमाउसो ! निग्गंथे पावयणे अट्टे अयं परमट्टे सेसे अणड़े उसियफलिहा अचंगुयदुवारा अचियत्तंतेउरपरघरपवेसा चाउद्दसट्टमुद्दिवपुषिणमासिणीसु पडिपुन्नं पोसह सम्म अणुपालेमाणा समणे निग्गंथे फासुएसणिज्जेणं असणपाणखाइमसाइमेणं वत्यपडिग्गहकंबलपायपुंछणेणं ओसहभेसजेणं पीठफलगसेज्जासंथारएणं पडिलाभेमाणा बहहिं सीलचयगुणवेरमणपञ्चक्खाणपोसहोववासेहिं अहापरिग्गहिएहिं तवोकम्मेहिं अप्पाणं भावमाणा विहरंति ॥ ते णं एपारवेणं विहारेणं विहरमाणा यहई वासाई समणोबासगपरियागं पाउणंति पाउणित्ता आवाहंसि उप्पन्नसि वा अणुप्पन्नंसि वा बहुई भत्ताई पञ्चक्खायंति बहई भत्ताई पञ्चक्खाएत्ता बहई भत्ताई अणसणाए छेदेन्ति पहुई भत्ताई अणसणाए छेत्ता आलोइयपडिकंता समाहिपत्ता कालमासे कालं किच्चा अन्नयरेसु देवलोएसु देवसाए उबवत्तारो भवंति, तंजहा-महड्डिएमु महज्जुइएसु जाव महामुक्वेसु सेसं तहेव जाच एस ठाणे आयरिए जाव एगंतसम्म साह । तच्चस्स ठाणस्स मिस्सगस्स विभंगे एवं आहिए ॥ अविरई पहुच बाले आहिजइ, विरई पडुच्च पंडिए आहिजइ, विरयाविरई पडुच्च बालपंडिए आहिजइ, तत्थ णं जा सा सवतो अविरई एस ठाणे आरंभट्ठाणे अणारिए जाव असबदुवप्पहीणमग्गे एगंतमिच्छे असाह, तत्थ णं जा सा सबतो बिरई एस ठाणे अणारंभट्ठाण आरिपजाव सबदुक्खप्पहीणमग्गे एगतसम्म साह, तस्थ ॥३३५॥ ~201~
SR No.035004
Book TitleSavruttik Aagam Sootraani 1 Part 04 Sootrakrut Mool evam Vrutti Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagarsuri, Dipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherVardhaman Jain Agam Mandir Samstha Palitana
Publication Year2017
Total Pages392
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size84 MB
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