SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 32
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ निमित्त [२७ में आयु का निषेक उदय में आना वह क्रमबद्ध है परन्तु उस आयु की उदीरणा कर घात कर देना यह क्रम है । __ प्रश्न--आत्मा में एक ही साथ में दो अवस्था कैसे होती होगी ? ___ उत्तर-आत्मा में विकारी अवस्था दो प्रकार की होती है, ( १ ) अबुद्धि पूर्वक, ( २ ) बुद्धिपूर्वक, जिसे शास्त्रीय भाषा में औदयिक भाव तथा उदीरणा भाव कहते हैं । ओदयिक भाव कम के उदय के अनुकूल ही होते हैं और कर्म का उदय होना कालद्रव्य के आधीन है, जिस कारण प्रोदयिक भाव क्रमबद्ध ही होता है । उदीरणाभाव में भाव के अनुकूल सत्ता में पड़े हुए कर्म उदयावली में आते हैं परन्तु काल के आधीन नहीं हैं बल्कि आत्मा के पुरुषार्थ के आधीन हैं । जिस कारण आत्मा जो भाव करे सो हो सकता है इस कारण उदीरणाभाव अक्रम है । ओदायिक भाव के साथ में उदीरणा भाव हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है किन्तु उदीरणाभाव जहाँ है वहां ओदयिक भाव नियम से है । मादयिक भाव में समय समय में बन्ध पडता है परन्तु उदीरणा भाव में समय समय में बन्ध पडता नहीं है । परन्तु जिस औदायिक भाव से समय समय में बन्ध पडता है उस भाव में उदीरणाभाव द्वारा अपकर्षण, उत्कर्षण, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034982
Book TitleNimitta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBramhachri Mulshankar Desai
PublisherBramhachri Mulshankar Desai
Publication Year1955
Total Pages38
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy