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________________ ८-जिस तरह तुम से पहिले लोगों पर रोज़ा ( उपवास) रखना फर्ज था तुम पर भी फर्ज किया गया जिससे तुम बहुत से गुनाहों से बचो । और जिनको खाना देना जरूरी है उन पर एक रोजे का बदला एक मोहताज को खाना खिला देना है । ९-रोजों की रातों में अपनी, बीवियों के पास जाना तुम्हारे लिये जायज़ कर दिया गया है । अल्लाह ने देखा कि तुम चोरी चौरी उनके पास जाने से अपना दीनी नुकसान करते थे। ( आमलोग मजहबी उसूलों पर ईमानदारी से कितना अमल कर सकते हैं इसका काफ़ी खयाल इसलाम में रक्खा गया है इसीलिये ज़रूरत के मुताबिक आयतें मनसूख होती रही हैं ।) १०-जो लोग तुम से लड़ें तुम भी अल्लाह के रास्ते में उनसे लड़ो मगर ज़ियादती न करना। अल्लाह ज़ियादती करनेवालों को पसन्द नहीं करता । ....... जब तक काफ़िर अदबवाली मसजिद के पास तुम से न लेंडे तुम भी उस जगह उनसे न लड़ो । 'अपने हाथों अपने को हलाकत में न डालो (हत्या में न फँसाओ) और एहसान करो। ११--हज के दिनों में न कोई शहवत (स्त्री पुरुष का सहवास) की बात करे, न गुनाह की, नं लड़ाई की। १२.-शराब और जुए के बारे में दर्याफ्त करते हैं । कह दो इन दोनों में बड़ा गुनाह है। १३-यतीमों के बारे में समझा दो कि उनकी बेहतरी बेहतर है और उनसे मिलजुलकर रहो, वे तुम्हारे भाई हैं। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034928
Book TitleKuran ki Zaki
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSwami Satyabhakta
PublisherSwami Satyabhakta
Publication Year
Total Pages32
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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