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________________ ( १३ ) का ध्यान रखकर करना चाहिये, क्योंकि ध्यानादि धर्मक्रियाओं को साधन करने योग्य स्थान शांतिमय एवं पवित्र ही होना चाहिये । १ प्रश्नावली (१) तीर्थक्षेत्र का महत्व लिखो। (२) धार्मिक उन्नति या आत्मा की उन्नति के वास्ते तीर्थयात्रा क्यों आवश्यक है ? (३) सच्ची तीर्थयात्रा और तीर्थवन्दना किस प्रकार होती है ? (४) किस प्रकार की हुई तीर्थयात्रा निष्फल और पाप कर्म बंध का कारण होती है। १-'जनसंसर्गे वाक् चित् परिस्पन्द मनो भ्रमा'। उत्तरोत्तर वीजानि ज्ञानिजन मतस्त्यजेत् ॥ ७ ॥ -ज्ञानार्णव तीर्थप्रबन्धकों को स्वयं ऐसा प्रबंध करना चाहिये जिस से बाहरी गंदगी न फैलने पावे। ज्यादा तादाद में शौचगह बनाने चाहिये और उनकी सफाई के लिए एक से अधिक भंगी रखने चाहिये। उनमें फिनाइल डलवाकर रोज धुलवाना चाहिये। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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