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________________ ( ११६ ) में खुदा हुआ प्राचीन है । यही मन्दिर 'मेदगिरि' नाम से प्रसिद्ध है इसमें नकाशी का काम बहुत अच्छा है । स्तंभों और छत की रचना अपूर्व है । श्री शांतिनाथजी की प्रतिमा दर्शनीय है । इस मन्दिर के समीप ही लगभग २०० फीट की ऊंचाई से पानी को धारा पड़ती है, जिससे एक रमणीय जलप्रपात बन गया है । यहां के जलप्रपातों के कारण यह क्षेत्र अति शोभनीक दिखता है । पार्श्वनाथ भगवान् का नं० १ का मन्दिर भी प्राचीन और दर्शनीय शिल्प का नमूना है । यह प्रतिमा सप्तफणमंडित प्राचीन है इस पर्वत से साढ़े तीन करोड़ मुनि मुक्ति पधारे हैं । यहाँ पर निरन्तर केशर की वर्षा होती बताई जाती है । वहां से अमरावती होकर भातकुली जावे। श्रमरावती में १४ मंदिर व २२ चैत्यालय हैं । भातकुली अमरावती से भातकुली दस मील दूर है । यह अतिशय क्षेत्र केशरियाजी की तरह प्रभावधारी है । यहां ३ दि० जैनमंदिर व दो चैत्यालय हैं । श्री ऋषभनाथजी की प्रतिमा मनोज्ञ है । यहां से अमरावती और कामठी होकर रामटेक जावे । रामटेक स्टेशन से डेढ़ मील के फासले पर जैन धर्मशाला है। शहरके Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034882
Book TitleJain Tirth aur Unki Yatra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherDigambar Jain Parishad Publishing House
Publication Year1946
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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