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________________ श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन १.२७ वहाँ आपसे महाराजा रामसिंहजीने कहाः “ आप कोई चम त्कार दिखाइए । " "" आपने जवाब दियाः- “हम साधु क्या चमत्कार दिखायँगे महाराजा रामसिंहने आग्रह किया तब उन्होंने कहा :- " देखिए आपके सामनेवाला थंभा मेरे सवालों का जवाब देता है।" फिर भको संबोधन कर कुछ प्रश्न किये । भने उनका जवाब दिया । यह चमत्कार देखकर महाराज रामसिंहजी बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने कहा: - " कहिए मैं क्या आपकी सेवा करूँ ? " तब आपने कहाः “ यहाँके कुछ श्रावकों और यतियोंके साथ हमारा मुकदमा चल रहा है । आप उसे ठीक कर दीजिए । "" महाराजा रामसिंहजीने आपकी इच्छानुसार मुकदमा फैसल कर दिया और जिन यतियोंने आपका अपमान किया था उन्हें सजा दिलाई । जयपुर में पहले आप दूसरे मकानमें ठहरे हुए थे; इस मुकदमेके जीतने पर आप कुंदीगरोंके भैरूंजीके पासवाले खरतर गच्छके उपाश्रयमें आ गये और सभी श्रावक मानने लगे । महाराजा रामसिंहजीके कोई काम था । उसके लिए वे एक दिन उपाश्रय आये । वहीं भोजन भी - महलोंसे काँसा मँगवाकर - किया था । महाराज साहबने एक कागज में पहलेहीसे लिख कर कुछ रख दिया था । रामसिंहजी भोजन कर चुके उसके बाद उन्होंने पूछा:- " महाराज, मेरा एक सवाल है । " आपने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034871
Book TitleJain Ratna Khand 01 ya Choubis Tirthankar Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKrushnalal Varma
PublisherGranth Bhandar
Publication Year1935
Total Pages898
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size96 MB
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