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________________ चार अंगुल अंतर रखके थोमासा मस्तक नीचा नमावी एक किसी जीव रहित वस्तु नपर दृष्टि लगाके खमा रहुंगा २; गृहस्तका विनय नही करुंगा ३: मौन धारके रहुंगा ४; हायमेही लेके नोजन करूंगा, पात्रमे नदी ५, ये अनिग्रह नियम धारण करेथे. प्रज-श्रीमहावीरस्वामीजीने बद्मस्ल का. लमे कैसे कैसे परीग्रह परीषह उपसर्ग सहन करे थे तिनका संदेपसे ब्यान करो. न. प्रथम नपसर्ग गोवालीयेने करा १ शूलपाणिके मंदिरमें रहे तहां शूलपाणी यदने उपसर्ग करे ते ऐसे अदृष्ट हासी करके मराया १ हाथीका रूप करके नपसर्ग करा २ सर्पके रूपसें ३पिशाचके रूपसें । नपसर्ग सरा. पी मस्तकमे १ कानमे २ नाकमे ३ नेत्रोंमे ४ दांतोमें ५ पुग्में ६ नखेमे ७ अन्य सुकुमार अंगोमें ऐसी पीमा कीनीके जेकर सामान्य पुरुष एक अंगमेनी ऐसी पीमा होवे तो तत्काल मरण पावे, परंगवंतनेतो मेरुकी तरें अचल होके अदीन मनसे सहन Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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