SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 244
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १२० दि शुचि आहारके खाने रूपहै. तथा चाहुः॥श्रा हारे शुचिता, स्वरे मधुरता, नोमे निरारंजता । बंधी निर्ममता, वने रसिकता, वाचालता माधवे॥ त्यत्का तधिज कोकील, मुनिवरं दूरात्पुनःनिकं। वंदते वत खंजनं, कृमि नुजं चित्रा गतिः कर्म णां ॥१॥ परंतु रूप नही काकादिसेंनी हीनरूप होनेसे ३ तैसेंहो कितनेक गुरुयोंमें सम्यक् क्रिया १नपदेश २ तोहै, परंतु रूप (साधुका वेष) किसी हेतुसे नहीं है, सरस्वतीके बुमाने वास्ते यति वेष त्यागि कालिकाचार्य वत् ॥ भसि पांचमा गुरु स्वरूप नेद ॥ ५॥ बहा गुरु हंस समान है. ६ ___ हंसमे रूप प्रसिद्ध है १ क्रिया कमल नाला दि आहार करनेसे अछोहै २ परंतु हंसमे उपदेश (मधुर स्वर) पिक शुकादिवत् नही है ३ तैसें ही कितने एक गुरुयोंमें साधुका वेष १ सम्यक् कि यातो है ३ परंतु उपदेश नही, गुरुने नपदेश करनेकी आज्ञा नही दोनी है, अनधिकारी होनेसें धन्यशालिनशदि महा कृषियोंवत् ॥ इति बन Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy