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________________ २५७ गुरु यतिके वेषवालेनी नहीहै । और उपदेशक नी नही है । परंतु क्रिया है, जैसे प्रत्येक बुझा दिकोंमे प्रत्येकबुछ, स्वयंबुद्ध तीर्थकरादि यद्यपि साधुतो है, परंतु तीर्थगत साधुयोंके साथ प्रवच न १ लिंगसे २ साधर्मिक नहीं है, इस वास्ते यति वेष नी नही,१ उपदेशक नी नही ५ "देशनाऽना सेवकः प्रत्येकबुझदि रित्यागमात्" क्रियातो है, क्योंकि तिस नवसेंही मोद फल होनाहै ॥ इति तृतियो गुरु स्वरूप नेद ॥३॥ चौथा अरु मोर समान है. ४ जैसे मोरम रूपतो है पंच वर्ण मनोहर १ और शब्द मधुर केकारूप है । परं किया नही है, सादिकोंकोजो नकरा कर जाता है, निर्दय होनेसे ३ तैसें गुरुयों कितनेकमें वेष १ उपदेशतो है परंतु सक्रिया नही है, ३ मंग्वाचार्यवत् ॥ इति चोथा गुरु स्वरूप नेद ॥४॥ पांचमा गुरु कोकोला समान है. ५ कोकिलामें सुंदर उपदेश (शब्द) तो है, पं चम स्वर गानेसें १ और किया आंबकी मांजरा. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat ____www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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