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________________ ५२६ प्रमादके सेवनेसे ३ परंतु नपदेश शु मार्ग प्ररू पण रूप है ३ प्रमादमें पके और परिव्राजकके वेषधारी झपन्न तीर्थंकरके पोते मरीच्यादिवत् अथवा पासबे आदिवत् क्योंकि पासबेमें साधु समान क्रिया तो नहीं है १ और प्रायें सुबिहित साधु समान वेषनी नही, यमुक्तं ॥ वबंदुपमिले हियमपाणसकन्निकूलाई इत्यादि।अर्थः-वस्त्र उप्रति लेखित प्रमाण रहित सदशक पछेवमी र खनेसें सुविहितका वेष नही परं शुद्ध प्ररूपक है, एक यथादेकों वर्जके पासबा १ अवसन्ना २ कुशील ३ संसक्त ४ ये चारों शुः प्ररूपक होस क्तेहै, परंतु दिन प्रतिदश जणोका प्रतिबोधक नं. दिषेसरीषे इस नांगेमें न जानने, क्योंके नं. दिषेणके श्रावकका लिंग था ॥ इति उसरा गुरु स्वरूप नेद ॥॥ तीसरा गुरु मरे समान है. ३ उमरमें सुंदर रुप नही, कश्न वर्म होनेसे १ नपदेश (तिसका नदात्त मधुर स्वर) नहीं है । केवल क्रियाहै नत्तम फूलोंमेंसें फूलोंकों विना मुख देनेसे तिनका परिमल पीनेसे ३ तैसेही कितनेक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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