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________________ १७७ १४ दो बाहु २ दो साथल ध पीठ ५ मस्तक ६ नरुबाती 9 नदर पेट ८ ये आठ अंग और अंगो के साथ लगा हुआ, जैसें हाथसें लगी अंगुली साथलसें लगा जानु, गोमा आदि इनका नाम नृपांग है, शेष अंगुली के पर्व रेखा रोम नखादि प्रमुख अंगोपांग है; जिसके उदयसे ये अंगोपांग पावे और इनपणे नवीन पुल परिणमावे ऐसी जो कर्मकी शक्ति तिसका नाम नपांग नाम कर्म है. नदारीकोपांग १५ वैक्रियोपांग, १६ आहारिकोपांग, १७ इति उपांग नामकर्म || पूर्वे बांध्या हुआ नदारिक शरीरादि पांच प्रकृति और इन पांचोके नवी न बंध होतेको पिबले साथ मेलकरके बधावे जैसे राल लाखादि दो वस्तुयोंकों मिला देते है, तेसेह | जो पूर्वापर कर्मको संयोग करे, सो बंधन नाम कर्म शरीरोंके समान पांच प्रकारका है. नदारिक बंधन वैक्रियबंधन इत्यादि एवं, २२ प्रकृति हुइ. पांच शरीरके योग्य विखरे हुए पुलांको एक े करे, पीछे बंधन नामकर्म बंध करे, तिस एकछे करणेवाली कर्म प्रकृतिका नाम संघातन नामक Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat - www.umaragyanbhandar.com
SR No.034862
Book TitleJain Dharm Vishayak Prashnottar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Atmanand Sabha
PublisherJain Atmanand Sabha
Publication Year1907
Total Pages270
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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