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________________ 卐 5 सोलवीं शताब्दी के जगदगुरु हीरसूरीश्वरजी 5 जन्मकाल : इस परिवर्तनशील, संसार में प्रबल पुण्यराशिके साथ - जीव मनुष्य जीवन में आते है, और अपना देव-दुर्लभ अमूल्य मानवभवको विषय कषायके कीडे बनके व्यर्थ गमा देते है; याने प्राप्ति की जीत पराजीत में परिवर्तन कर देते है । किंतु उसका ही भव सफल होता है जो महापुरुषके सत्संग को प्राप्त कर स्वकल्याण के साथ अन्य जीवों को उर्ध्वगमन कराने के लिये दिवादांडी रूप बनते है । गुजरात- बनासकांठा जिले में धर्म-धन और बाह्य-धन से युक्त पालणपुर नामका बडा शहर था । उस नगर में सदा धर्म कार्य में आसक्त कुंकूंराशा श्रेष्टी बसते थे । उनकी शीलादि गुण वैभव सम्पन्न नाथीबाई नामक धर्म- प्रिया थी । सांसारिक सुखका उपभोग करते हुये आपको चार पुत्र और तीन लडकियाँ हुई थी । उनके नाम थे संघजी, सूरजी, श्रीपाल एवं हीरजी । और रंभा, राणी एवं विमला। हीरजीका जन्म वि. सं. १५८३ मार्गशिर्ष शुक्ल नवमी सोमवार के दिन हुआ था। 'पुत्रका लक्षण पालणे में' इस कहावत के अनुसार छोटे लडके होरजी का तेजप्रताप - देहलालित्य भव्य था एवं आकर्षित था । उनको बडे प्रेम से बुलाते थे और खोलाते थे । से धर्म प्रति आदरबाले थे । पूर्वका क्षयोपशम प्रवीण थे । व्यवहारिक ज्ञानाभ्यास के साथ धर्म गुरुवर के पास जा कर धर्म का तत्त्वज्ञान प्रसन्न चित्त से सुनते थे । जिससे उसने अपना अंतःकरण वैराग्य रंग से रङ्गित बना दिया था । इससे सब लोग हौरजी लडकपन से ज्ञानमें भी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034852
Book TitleJagadguru Heersurishwarji
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherLabdhi Bhuvan Jain Sahitya Sadan
Publication Year
Total Pages60
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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