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________________ ग्रंथ गर्भावलि। [६८ ] कन्या होय कोग तत्व बुझे, पकर शस्त्र रणमांही झूझे । जमे नीर तो यह फल होई, नहि तो कंद्रप जाय बिगोई । छठ शनिश्चरका एहि बिचारा, सूर चले जलतत्वकी धारा । नीच होय अति धनपत कही, वो तो हाथ उठावे नही । नीर जमे तो यह गुन होई, ना तौ बिंद जमे नहि कोई । सातम रविका करो बिचारा, सूर चले जलतत्व अपारा । पुरुष होय तत्वहीन तन होई, मरद होय नपुंसक देही । जो जल जमे तो होयही ऐसा, नातो कंद्रप जमे नहि कैसा । आठम तिथि चंद्रको वारा, जमे कंद्रप आकाशकी धारा । भितर छीजे बाहेर नहि आवे, गर्भ गले कोई चैन नहि पावे । तत्व आकाशका एही विचारा, छीजे कंद्रप गर्भ मंझारा । नवमी मंगलका एही बिचारा, चले सूरज तेजकी धारा । नर उपजे जो बहत विख्याता. अटके जिभ्या करत है बाता। धन धान्य होय घर मांही, सबही दुनियां करहि बडाई । जो उपजे तो ऐसा होई, ना तो कंद्रप जाय बिगोई । बुध दसमीका करो बिचारा, चंद्र चले वायुतत्वकी धारा । कन्या होय नहि करे संतोषा, काम संपूर्ण होय नहि अंगा। जो जमे तो यह फल होई, नातो नीर जमे नहि कोई । गुरुवार तिथि एकादशी होई, ऐसी जुगत पावे नहि कोई । सुर चले पृथ्वीकी धारा, धनवंत नर होय अपारा । बहुत द्रव्यका लहे सुख भारी, ऐसा देखो तत्व बिचारी । जो जमे तो येही तत्व जामे, नहि तो निष्फल जाय अकामे । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034841
Book TitleGyan Swaroday
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKabir Sadguru
PublisherKabir Dharmvardhak Karyalay
Publication Year1949
Total Pages86
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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