________________
ज्ञान स्वरोदय। [२४]
अग्नि चक्र दो दल कमल, त्रिकुटी ध्यान अनूप । जाप सहस्र तहवां जपै, पावै ज्योति सरूप ॥१८६॥ सहस्र दलन को कमल है, गगन मंडल में वास । जाप सहस्र तहवां जौ, तेज पुंज परकास ॥१८७॥ योगयुक्ति करिखोजिले, सुरति निरति करि चीन्ह । दश प्रकार अनहद बजे, होय जहां लौलीन्ह ॥१८८॥ तीन बंध नौ नाडिका, दसौ वायु को जान । प्रान अपान समान है, अरु कहिये ऊदान ॥१८९॥ व्यान बंध अरु किरकिरा, कूर्म वायु को जीत । नाग धनंजय देवदत, दसौ वायु है मीत ॥१९॥ दसौं द्वार को बंध करि, उत्तम नाड़ी तीन । इंगला पिंगला सुषमना, केलि करे परवीन ॥१९१॥ करते अरपन नाम को, तर गये पतित अनेक । अनहद धुनि के बीच में, देखा खेल अनेक ॥१९२॥ पूरक करै कुंभक करै, रेचक वायु उतार । ऐसे प्राणायाम कर, सूक्षम कीजै हार ॥१९३॥ धरती बंध लगाय के, दसौं बायु को रोक । मस्तक वायु चढाय के, जाय अमर पुर लोक ॥१९४॥ पांचौं मुद्रा साधि के, पावै घट का भेद । नाड़ी शिखर चढाय के, पट चक्रन को छेद ॥१९५॥
Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
www.umaragyanbhandar.com